गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextरामगीता—( १ )
[पुराणेतिहास ग्रन्थोंमें कई रामगीताएँ पायी जाती हैं। प्रत्येकमें वक्ता भगवान् श्रीराम ही हैं, परंतु श्रोता तथा प्रतिपाद्य-विषय भिन्न-भिन्न है। अध्यात्मरामायणके उत्तरकाण्डके पंचम सर्गके रूपमें एक रामगीता प्राप्त होती है। सीता-वनवास प्रसंगके अनन्तर एक बार जब लक्ष्मणजीने भगवान् श्रीरामचन्द्रजीसे अज्ञानरूपी सागरको पार करानेवाले ज्ञानोपदेश देनेकी प्रार्थना की, तब श्रीरघुनाथजीने उनको जो उपदेश दिया, वही ‘रामगीता’ कहलाती है। इसमें युक्तियुक्त विवेचनद्वारा आत्मज्ञानको ही विशुद्ध ज्ञान बताकर समस्त इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके आत्मानुसन्धानहेतु प्रेरित किया गया है। विवेच्य-सामग्री गूढ़ वेदान्तिक होते हुए भी सहज तथा सारगर्भित है। इस रामगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]
श्रीमहादेव उवाच
कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं
रामं रमालालितपादपङ्कजम्।
सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः
प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत्॥ १॥
किसी दिन भगवान् राम, जिनके चरणकमलोंकी सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजीने (उनके पास जाकर) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर अति विनीतभावसे कहा—॥ १॥
त्वं शुद्धबोधोऽसि हि सर्वदेहिना-
मात्मास्यधीशोऽसि निराकृतिः स्वयम्।