गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* उत्तरगीता * ३७३
करनेवाला मेरा महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण काश्यप इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चला गया॥ ५३॥
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तमः।
मोक्षधर्माश्रितः सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत॥ ५४॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—अर्जुन! मोक्षधर्मका आश्रय लेनेवाले वे सिद्धमहात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ५४॥
कच्चिदेतत् त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा।
तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि॥ ५५॥
पार्थ! क्या तुमने मेरे बताये हुए इस उपदेशको एकाग्रचित्त होकर सुना है? उस युद्धके समय भी तुमने रथपर बैठे-बैठे इसी तत्त्वको सुना था॥ ५५॥
नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः।
नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना॥ ५६॥
कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है॥ ५६॥
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ।
कच्चिन्नेदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित्॥ ५७॥
भरतश्रेष्ठ! यह मैंने देवताओंका परम गोपनीय रहस्य बताया है। पार्थ! इस जगत्में कभी किसी भी मनुष्यने इस रहस्यका श्रवण नहीं किया है॥ ५७॥