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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 370 of 675

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Page 370
  • उत्तरगीता * ३६९

योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु।
दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन् सनिवसेत् पुरे॥ ३३॥
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाह्यतः।
एकान्तमें ध्यान करनेवाले पुरुषको जिस प्रकार योगकी प्राप्ति होती है, वह सुनो—जो उपदेश पहले श्रुतिमें देखा गया है, उसका चिन्तन करके जिस भागमें जीवका निवास माना गया है, उसीमें मनको भी स्थापित करे। उसके बाहर कदापि न जाने दे॥ ३३ १/२ ॥

पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत्।
तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मनः॥ ३४॥
शरीरके भीतर रहते हुए वह आत्मा जिस आश्रयमें स्थित होता है, उसीमें बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसहित मनको धारण करे॥ ३४॥

प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन् काले स पश्यति।
तस्मिन् काले मनश्चास्य न च किञ्चन बाह्यतः॥ ३५॥
मूलाधार आदि किसी आश्रयमें चिन्तन करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है, उस समय उसका मन प्रत्यक्स्वरूप आत्मासे भिन्न कोई ‘बाह्य’ वस्तु नहीं रह जाता॥ ३५॥

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने।
कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तयेत्॥ ३६॥
निर्जन वनमें इन्द्रिय-समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे॥ ३६॥

दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च।
हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम्॥ ३७॥
दन्त, तालु, जिह्वा, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ी-मार्ग)-को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे॥ ३७॥