गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यारहभेन्नरः।
तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम्॥ २५॥
जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं॥ २५॥
फलतृष्णां विहाय स्यात्सदा तृप्तो विसाधनः।
उद्युक्तोऽपि क्रियां कर्तुं किञ्चिन्नैव करोति सः॥ २६॥
जो फलकी इच्छाको छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करनेमें लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं॥ २६॥
निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः।
केवलं वै गृहं कर्माचरन्नायाति पातकम्॥ २७॥
जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता॥ २७॥
अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्च यः।
यथा प्राप्येऽहं सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते॥ २८॥
जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते॥ २८॥
अखिलैर्विषयैर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानवानपि।
यज्ञार्थं तस्य सकलं कृतं कर्म विलीयते॥ २९॥
सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणीके सारे कर्म यज्ञ ही हैं और उसकी सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं॥ २९॥