गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- उत्तरगीता * ३४५
ततः कदाचिन्निर्वेदान्निराकाराश्रितेन च।
लोकतन्त्रं परित्यक्तं दुःखार्तेन भृशं मया॥ ३८॥
इस प्रकार बारम्बार क्लेश उठानेसे एक दिन मेरे मनमें बड़ा खेद हुआ और मैंने दुःखोंसे घबराकर निराकार परमात्माकी शरण ली तथा समस्त लोकव्यवहारका परित्याग कर दिया॥ ३८॥
लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः।
ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादात्मनो मया॥ ३९॥
इस लोकमें अनुभवके पश्चात् मैंने इस मार्गका अवलम्बन किया है और अब परमात्माकी कृपासे मुझे यह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है॥ ३९॥
नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम्।
आसिद्धेराप्रजासर्गादात्मनोऽपि गताः शुभाः॥ ४०॥
अब मैं पुनः इस संसारमें नहीं आऊँगा। जबतक यह सृष्टि कायम रहेगी और जबतक मेरी मुक्ति नहीं हो जायगी, तबतक मैं अपनी और दूसरे प्राणियोंकी शुभगतिका अवलोकन करूँगा॥ ४०॥
उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथैयं सिद्धिरुत्तमा।
इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः॥ ४१॥
ब्रह्मणः पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशयः।
नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परन्तप॥ ४२॥
द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मुझे यह उत्तम सिद्धि मिली है। इसके बाद मैं उत्तम लोकमें जाऊँगा। फिर उससे भी परम उत्कृष्ट सत्यलोकमें जा पहुँचूँगा और क्रमशः अव्यक्त ब्रह्मपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लूँगा। इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। काम-क्रोध आदि शत्रुओंको सन्ताप देनेवाले काश्यप! अब मैं पुनः इस मर्त्यलोकमें नहीं आऊँगा॥ ४१-४२॥