गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- नारदगीता * ३२९
प्रकारके रोग मनुष्योंको मथ डालते हैं, तब उनमें उठने-बैठनेकी भी शक्ति नहीं रह जाती, इसमें संशय नहीं है॥ २९॥
व्याधिभिर्मथ्यमानानां त्यजतां विपुलं धनम्।
वेदनां नापकर्षन्ति यतमानाश्चिकित्सकाः॥ ३०॥
रोगोंसे पीड़ित हुए मनुष्य वैद्योंको बहुत-सा धन देते हैं और वैद्यलोग रोग दूर करनेकी बहुत चेष्टा करते हैं तो भी उन रोगियोंकी पीड़ा दूर नहीं कर पाते हैं॥ ३०॥
ते चातिनिपुणा वैद्याः कुशलाः सम्भृतौषधाः।
व्याधिभिः परिकृष्यन्ते मृगा व्याधैरिवार्दिताः॥ ३१॥
बहुत-सी ओषधियोंका संग्रह करनेवाले चिकित्सा में कुशल चतुर वैद्य भी व्याधोंके मारे हुए मृगोंकी भाँति रोगोंके शिकार हो जाते हैं॥ ३१॥
ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः॥ ३२॥
बड़े-बड़े हाथी जैसे वृक्षोंको झुका देते हैं, वैसे ही वे तरह-तरहके काढ़े और नाना प्रकारके घी पीते रहते हैं तो भी वृद्धावस्था उनकी कमर टेढ़ी कर देती है; यह देखा जाता है॥ ३२॥
के वा भुवि चिकित्सन्ते रोगार्तान् मृगपक्षिणः।
श्वापदानि दरिद्रांश्च प्रायो नार्ता भवन्ति ते॥ ३३॥
इस पृथ्वीपर मृग, पक्षी, हिंसक पशु और दरिद्र मनुष्योंको जब रोग सताता है, तब कौन उनकी चिकित्सा करने जाते हैं? किंतु प्रायः उन्हें रोग होता ही नहीं है॥ ३३॥
घोरानपि दुराधर्षान् नृपतीनुग्रतेजसः।
आक्रम्याददते रोगाः पशून् पशुगणा इव॥ ३४॥
परन्तु बड़े-बड़े पशु जैसे छोटे पशुओंपर आक्रमण करके उन्हें दबा देते हैं, उसी प्रकार प्रचण्ड तेजवाले, घोर एवं दुर्धर्ष राजाओंपर