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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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हंसगीता-( २ )

[एक हंसगीता महाभारतके शान्तिपर्वमें पितामह भीष्म एवं धर्मराज युधिष्ठिरकी वार्ताके अन्तर्गत भी प्राप्त होती है। इसमें साध्यगणनामक देवताओंको हंसरूपधारी भगवान्‌द्वारा मोक्षधर्मका तत्त्व समझाया गया है। प्रायः सभी उपदेश सदाचारविषयक तथा सर्वोपयोगी हैं। इसमें सत्यभाषण और इन्द्रियसंयम आदिको ही सार बताकर उन्हें मोक्षका हेतु बताया गया है। इस हंसगीताको भी यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]

युधिष्ठिर उवाच

सत्यं दमं क्षमां प्रज्ञां प्रशंसन्ति पितामह।
विद्वांसो मनुजा लोके कथमेतन्मतं तव॥ १॥

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! संसारमें बहुत-से विद्वान् सत्य, इन्द्रिय-संयम, क्षमा और प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि)-की प्रशंसा करते हैं। इस विषयमें आपका कैसा मत है?॥ १॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम्।
साध्यानामिह संवादं हंसस्य च युधिष्ठिर॥ २॥

भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें साध्यगणोंका हंसके साथ जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ॥ २॥

हंसो भूत्वाथ सौवर्णस्त्वजो नित्यः प्रजापतिः।
स वै पर्यैति लोकांस्त्रीनथ साध्यानुपागमत्॥ ३॥

एक समय नित्य अजन्मा प्रजापति सुवर्णमय हंसका रूप धारण करके तीनों लोकोंमें विचर रहे थे। घूमते-घामते वे साध्यगणोंके पास जा पहुँचे॥ ३॥