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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 28 of 675

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Page 28
  • गणेशगीता * २७

अनीर्ष्यन्तो भक्तिमन्तो ये मयोक्तमिदं शुभम्।
अनुतिष्ठन्ति ये सर्वे मुक्तास्तेऽखिलकर्मभिः॥ ३१॥

ईर्ष्या न करनेवाले जो भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ मार्गका अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ३१॥

ये चैव नानुतिष्ठन्ति त्वशुभा हतचेतसः।
ईर्ष्यमाणान् महामूढान्नष्टांस्तान् विद्धि मे रिपून्॥ ३२॥

जो अज्ञानसे चित्तके नष्ट होनेके कारण इस मार्गका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन ईर्ष्यालु, मूर्ख और नष्टबुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो॥ ३२॥

तुल्यं प्रकृत्या कुरुते कर्म यज्ज्ञानवानपि।
अनुयाति च तामेवाग्रहस्तत्र मुधा मतः॥ ३३॥

जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार चेष्टा करता है और उसी स्वभावका अनुगमन करता है तो स्वभावको ग्रहण न करना व्यर्थ है॥ ३३॥

कामश्चैव तथा क्रोधः खानामर्थेषु जायते।
नैतयोर्वश्यतां यायादस्य विध्वंसकौ यतः॥ ३४॥

कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियके विषयोंमें काम और क्रोध उत्पन्न होते हैं, इनके वशमें नहीं होना चाहिये, कारण कि यही प्राणीके शत्रुरूप हैं॥ ३४॥

शस्तोऽगुणो निजो धर्मः साङ्गादन्यस्य धर्मतः।
निजे तस्मिन् मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः॥ ३५॥

अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरेका धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भी परलोकमें कल्याणकारी है, परंतु दूसरेका श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है॥ ३५॥