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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 272
  • यमगीता ( २ ) * २७१

हेतु है'—यह ब्रह्माजीका सिद्धान्त है॥७॥
कर्तव्यमिति यत्कर्म ऋग्यजुःसामसंज्ञितम्।
कुरुते श्रेयसे सङ्गान् जैगीषव्येण गीयते॥८॥
जैगीषव्यका कहना है कि 'ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदमें प्रतिपादित जो कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य समझकर अनासक्तभावसे करना श्रेयका साधन है'॥८॥
हानिः सर्वविधित्सानामात्मनः सुखहेतुकी।
श्रेयः परं मनुष्याणां देवलोद्गीतमीरितम्॥९॥
'सब प्रकारकी विधित्सा (कर्मारम्भकी आकांक्षा)-का परित्याग आत्माके सुखका साधन है, यही मनुष्योंके लिये परम श्रेय है'—यह देवलका मत बताया गया है॥९॥
कामत्योगात्तु विज्ञानं सुखं ब्रह्म परं पदम्।
कामिनां न हि विज्ञानं सनकोद्गीतमेव तत्॥१०॥
'कामनाओंके त्यागसे विज्ञान, सुख, ब्रह्म एवं परमपदकी प्राप्ति होती है। कामना रखनेवालोंको ज्ञान नहीं होता'—यह सनकादिकोंका सिद्धान्त है॥१०॥
प्रवृत्तञ्च निवृत्तञ्च कार्यं कर्मपरोऽब्रवीत्।
श्रेयसां श्रेय एतद्धि नैष्कर्म्यं ब्रह्म तद्धरिः॥११॥
दूसरे लोग कहते हैं कि प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों प्रकारके कर्म करने चाहिये। परंतु वास्तवमें नैष्कर्म्य ही ब्रह्म है, वही भगवान् विष्णुका स्वरूप है—यही श्रेयका भी श्रेय है॥११॥
पुमांश्चाधिगतज्ञानो भेदं नाप्नोति सत्तमः।
ब्रह्मणा विष्णुसंज्ञेन परमेणाव्ययेन च॥१२॥
जिस पुरुषको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, वह सन्तोंमें श्रेष्ठ है, वह अविनाशी परब्रह्म विष्णुसे कभी भेदको नहीं प्राप्त होता॥१२॥