गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextयमगीता-(२)
[एक यमगीता अग्निमहापुराणके अन्तर्गत भी प्राप्त होती है। यह गीता यमराजद्वारा नचिकेताके प्रति कही गयी है। इस यमगीताकी केन्द्रीय विषयवस्तु योगदर्शन है। इसके प्रारम्भमें प्राचीन कालके विभिन्न मनीषियों यथा—पंचशिख, जनक, जैगीषव्य, देवल आदिके मतानुसार मनुष्यके परमकल्याणके साधन बताये गये हैं, जिनके द्वारा आत्मचिन्तन तथा अनासक्त भावसे शास्त्रोक्त कर्म करनेकी प्रेरणा मिलती है। इसके बाद इसमें योगमार्गका वर्णन है; विशेषकर यम–नियमके द्वारा मनका निग्रह करते हुए समाधि-अवस्था प्राप्त करनेका उपाय बताया गया है। जिससे जीव ब्रह्मभावमें स्थित हो जाता है, यह सारगर्भित एवं तात्त्विक यमगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]
अग्निरुवाच
यमगीतां प्रवक्ष्यामि उक्ता या नाचिकेतसे।
पठतां शृण्वतां भुक्त्यै मुक्त्यै मोक्षार्थिनां सताम्॥ १॥
**अग्निदेव कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं यमगीताका वर्णन करूँगा, जो यमराजके द्वारा नचिकेताके प्रति कही गयी थी। यह पढ़ने और सुननेवालोंको भोग प्रदान करती है तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले सत्पुरुषोंको मोक्ष देनेवाली है॥ १॥
यम उवाच
आसनं शयनं यानपरिधानगृहादिकम्।
वाञ्छत्यहोऽतिमोहेन सुस्थिरं स्वयमस्थिरः॥ २॥
**यमराजने कहा—**अहो! कितने आश्चर्यकी बात है कि मनुष्य अत्यन्त मोहके कारण स्वयं अस्थिरचित्त होकर आसन, शय्या, वाहन, परिधान (पहननेके वस्त्र आदि) तथा गृह आदि भोगोंको सुस्थिर मानकर प्राप्त करना चाहता है॥ २॥