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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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* गणेशगीता * २५


श्रेयान् यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः।
मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥ २१ ॥

जो कर्म महान् पुरुष करते हैं, वही कर्म अन्य सब करते हैं, वह जिसको प्रमाण मानते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं॥ २१॥

विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप।
अनालब्धश्च लब्धव्यः कुर्वे कर्म तथाप्यहम् ॥ २२ ॥

हे राजन्! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें भी दुर्लभ नहीं है और मैं कर्म करके किसी अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेकी भी इच्छा नहीं करता हूँ, फिर भी मैं कर्म करता हूँ॥ २२॥

न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभावितः।
करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते ॥ २३ ॥

और हे महामते! यदि मैं आलसी तथा स्वच्छन्द होकर कर्म न करूँ तो सभी वर्ण कर्म छोड़कर केवल मेरा अनुगमन करने लगेंगे॥ २३॥

भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः सम्प्रदायिनः।
हन्ता स्यामस्य लोकस्य विधाता सङ्करस्य च ॥ २४ ॥

तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण आचारभ्रष्ट होकर नष्ट हो जायँगे। इससे इस संसारका नाश करनेवाला और वर्णसंकरको उत्पन्न करनेवाला भी मैं ही होऊँगा॥ २४॥

कामिनो हि सदा कामैरज्ञानात्कर्मकारिणः।
लोकानां सङ्ग्रहायैतद्विद्वान् कुर्यादसक्तधीः ॥ २५ ॥

जिस प्रकारसे कामनावाले अज्ञानसे सदा कर्म करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान्‌को उचित है कि लोकसंग्रहके निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म करता रहे॥ २५॥