गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextयमगीता-( १ )
[ ‘यमगीता’ नामसे पुराण-वाङ्मयमें कई गीताएँ मिलती हैं। श्रीविष्णुपुराणके अन्तर्गत समाहित यमगीता उन्हींमेंसे एक है। यमके दूत किन मनुष्योंसे सदैव दूर ही रहते हैं—यही इस लघु कलेवरवाली गीतामें स्वयं यमराजद्वारा अपने दूतोंको बताया गया है। सच्चे भक्तोंके लक्षण बतानेके उपक्रममें जो सदाचार-विषयक चर्चा इसमें की गयी है, वह अत्यन्त प्रभावी होनेके साथ भगवान्के किसी भी स्वरूपके उपासकके लिये सहज ग्राह्य हो सकती है। वस्तुतः एक सनातन ब्रह्म ही विभिन्न रूपोंमें अभिव्यक्त है। अतएव विष्णुभक्त पदसे भक्तमात्रका तात्पर्य लेना चाहिये। सरल-सुबोध, परंतु मार्मिक भाषा-शैलीमें निबद्ध कल्याणकारी इस यमगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
श्रीमैत्रेय उवाच
यथावत्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया गुरो।
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वेकं तद्भवान्प्रब्रवीतु मे॥ १॥
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे गुरो! मैंने जो कुछ पूछा था, वह सब आपने यथावत् वर्णन किया। अब मैं एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये॥ १॥
सप्त द्वीपानि पातालविधयश्च महामुने।
सप्तलोकाश्च येऽन्तःस्था ब्रह्माण्डस्यास्य सर्वतः॥ २॥
स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मसूक्ष्मात्सूक्ष्मतैस्तथा।
स्थूलात्स्थूलतरैश्चैव सर्वप्राणिभिरावृतम्॥ ३॥
हे महामुने! सातों द्वीप, सातों पाताल और सातों लोक—ये सभी स्थान जो इस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत हैं; स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा स्थूल और स्थूलतर जीवोंसे भरे हुए हैं॥ २-३॥