गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- कामगीता *
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करता है, उसके मानसिक भावोंके साथ मैं इतना घुल-मिल जाता
हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता॥ १६॥
यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रतः।
ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम्॥ १७॥
जो कठोर व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य तपस्याके द्वारा मेरे
अस्तित्वको मिटा डालनेका प्रयास करता है, उसकी तपस्यामें ही मैं
प्रकट हो जाता हूँ॥ १७॥
यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः।
तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च।
अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः॥ १८॥
जो विद्वान् पुरुष मोक्षका सहारा लेकर मेरे विनाशका प्रयत्न करता
है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसीसे वह बँधा हुआ है।
यह विचारकर मुझे उसपर हँसी आती है और मैं खुशीके मारे नाचने
लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य एवं सदा
रहनेवाला हूँ॥ १८॥
तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः।
धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति॥ १९॥
अतः महाराज! आप भी नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा
अपनी उस कामनाको धर्ममें लगा दीजिये। वहाँ आपकी वह कामना
सफल होगी॥ १९॥
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता।
अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः॥ २०॥
मा ते व्यथास्तु निहतान् बन्धून् वीक्ष्य पुनः पुनः।
न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हताऽस्मिन् रणाजिरे॥ २१॥
विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेधका तथा पर्याप्त