गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextकामगीता
[महाभारतके आश्वमेधिक पर्वके अन्तर्गत भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर-संवादके रूपमें कामगीता प्राप्त है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णने कामप्रोक्त एक प्राचीन गाथाका वर्णन किया है, जिसमें बाह्य पदार्थोंके त्यागके स्थानपर उनमें ममत्वके त्यागको ही वास्तविक त्याग बताया गया है, जो महान् भयसे छुटकारा दिलानेवाला है। अत्यन्त लघु कलेवरवाली यह कामगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]
वासुदेव उवाच
न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत।
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा॥ १॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—भारत! केवल राज्य आदि बाह्य पदार्थोंका त्याग करनेसे ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शारीरिक द्रव्यका त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है॥ १॥
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृद्ध्यतः।
यो धर्मो यत् सुखं चैव द्विषतामस्तु तत् तथा॥ २॥
बाह्य पदार्थोंसे अलग होकर भी जो शारीरिक सुख-विलासमें आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुखकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करनेवालोंको ही प्राप्त हो॥ २॥
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्॥ ३॥
'मम' (मेरा) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और 'न मम' (मेरा नहीं है) यह तीन अक्षरोंका पद सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है॥ ३॥