गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 245 of 675
Read in context२४४ * गीता-संग्रह *
इस बातको जानता हूँ कि मृत्यु क्षणभरके लिये भी रुक नहीं सकती
और मैं उसके जालमें फँसकर ही विचर रहा हूँ, तब मैं थोड़ी देर
भी प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ?॥१०॥
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा।
गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा॥११॥
जब एक-एक रात बीतनेके साथ ही आयु बहुत कम होती
चली जा रही है, तब छिछले जलमें रहनेवाली मछलीके समान कौन
सुख पा सकता है?॥११॥
(यस्यां रात्र्यां व्यतीतायां न किञ्चिच्छुभमाचरेत्।)
तदैव वन्ध्यं दिवसमिति विद्याद् विचक्षणः।
अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम्॥१२॥
जिस रातके बीतनेपर मनुष्य कोई शुभ कर्म न करे, उस दिनको
विद्वान् पुरुष 'व्यर्थ ही गया' समझे। मनुष्यकी कामनाएँ पूरी भी नहीं
होने पातीं कि मौत उसके पास आ पहुँचती है॥१२॥
शष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्रगतमानसम्।
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति॥१३॥
जैसे घास चरते हुए भेंड़ेके पास अचानक व्याघ्री पहुँच जाती
है और उसे दबोचकर चल देती है, उसी प्रकार मनुष्यका मन जब
दूसरी ओर लगा होता है, उसी समय सहसा मृत्यु आ जाती है और
उसे लेकर चल देती है॥१३॥
अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम्।
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति॥१४॥
इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये।
आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे
ही पड़े रह जायँगे और मौत आपको खींच ले जायगी॥१४॥