गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुणसे
तो मेधावी था ही, नामसे भी मेधावी था॥ ३॥
सोऽब्रवीत् पितरं पुत्रः स्वाध्यायकरणे रतम्।
मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतत्त्वविचक्षणः॥ ४॥
वह मोक्ष, धर्म और अर्थमें कुशल तथा लोकतत्त्वका अच्छा ज्ञाता
था। एक दिन उस पुत्रने अपने स्वाध्यायपरायण पितासे कहा— ॥ ४॥
पुत्र उवाच
धीरः किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन्
क्षिप्रं ह्यायुर्भ्रश्यते मानवानाम्।
पितस्तदाचक्ष्व यथार्थयोगं
ममानुपूर्व्या येन धर्मं चरेयम्॥ ५॥
पुत्र बोला—पिताजी! मनुष्योंकी आयु तीव्र गतिसे बीती जा
रही है। यह जानते हुए धीर पुरुषको क्या करना चाहिये? तात!
आप मुझे उस यथार्थ उपायका उपदेश कीजिये, जिसके अनुसार मैं
धर्मका आचरण कर सकूँ॥ ५॥
पितोवाच
वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्र
पुत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम्।
अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो
वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत्॥ ६॥
पिताने कहा—बेटा! द्विजको चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य-
व्रतका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे; फिर गृहस्थाश्रममें
प्रवेश करके पितरोंकी सद्गतिके लिये पुत्र पैदा करनेकी इच्छा करे।
विधिपूर्वक त्रिविध अग्नियोंकी स्थापना करके यज्ञोंका अनुष्ठान करे।
तत्पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे। उसके बाद मौनभावसे रहते
हुए संन्यासी होनेकी इच्छा करे॥ ६॥