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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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Page 180
  • शम्पाकगीता * १७९

है। यह दुर्लभ होनेपर भी सुलभ है॥ ८॥

अकिञ्चनस्य शुद्धस्य उपपन्नस्य सर्वतः।
अवेक्षमाणस्त्रींल्लोकान् न तुल्यमिह लक्षये॥ ९॥

मैं तीनों लोकोंपर दृष्टि डालकर देखता हूँ तो मुझे अकिंचन, शुद्ध एवं सब ओरसे वैराग्यसम्पन्न पुरुषके समान दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है॥ ९॥

आकिञ्चन्यं च राज्यं च तुलया समतोलयम्।
अत्यरिच्यत दारिद्र्यं राज्यादपि गुणाधिकम्॥ १०॥

मैंने अकिंचनता तथा राज्यको बुद्धिकी तराजूपर रखकर तौला तो गुणोंमें अधिक होनेके कारण राज्यसे भी अकिंचनताका ही पलड़ा भारी निकला॥ १०॥

आकिञ्चन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानयम्।
नित्योद्विग्नो हि धनवान् मृत्योरास्यगतो यथा॥ ११॥

अकिंचनता तथा राज्यमें बड़ा भारी अन्तर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौतके मुखमें पड़ा हुआ हो॥ ११॥

नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः।
प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिषः॥ १२॥

परंतु जो मनुष्य धनको त्यागकर उसकी आसक्तिसे मुक्त हो गया है और मनमें किसी तरहकी कामना नहीं रखता, उसपर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहोंका, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही॥ १२॥

तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशायिनम्।
बाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः॥ १३॥

वह सदा दैव-इच्छाके अनुसार विचरता है। बिना बिछौनेके