गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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पहुँच जाता है (जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धिका विश्वास हो जाता
है), उसीको वह कर्तव्य समझता है। दूसरे विषयको नहीं॥ ३॥
यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत्।
तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः॥ ४॥
मनुष्य जैसे-जैसे संसारके पदार्थोंको सारहीन समझता है, वैसे-
ही-वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ४॥
एवं व्यवसिते लोके बहुदोषे युधिष्ठिर।
आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान् नरः॥ ५॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह जगत् अनेक दोषोंसे परिपूर्ण है, ऐसा
निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष अपने मोक्षके लिये प्रयत्न करे॥ ५॥
युधिष्ठिर उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते।
यया बुद्ध्या नुदेच्छोकं तन्मे ब्रूहि पितामह॥ ६॥
युधिष्ठिरने पूछा—दादाजी! धनके नष्ट हो जानेपर अथवा स्त्री,
पुत्र या पिताके मर जानेपर किस बुद्धिसे मनुष्य अपने शोकका निवारण
करे? यह मुझे बताइये॥ ६॥
भीष्म उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते।
अहो दुःखमिति ध्यायञ्शोकस्यापचितिं चरेत्॥ ७॥
भीष्मजीने कहा—[वत्स!] जब धन नष्ट हो जाय अथवा
स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तब ‘ओह! संसार कैसा दुःखमय
है’ यह सोचकर मनुष्य शोकको दूर करनेवाले शम-दम आदि साधनोंका
अनुष्ठान करे॥ ७॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत् सुहृत्॥ ८॥
इस विषयमें किसी हितैषी ब्राह्मणने राजा सेनजित्के पास आकर