गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* षड्जगीता * १५१
और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं॥ ८॥
तस्माद् धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना।
तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि॥ ९॥
अतः मनको वशमें करके धर्मको अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं॥ ९॥
वैशम्पायन उवाच
समाप्तवचने तस्मिन्नर्थशास्त्रविशारदः।
पार्थो धर्मार्थतत्त्वज्ञो जगौ वाक्यं प्रचोदितः॥ १०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—[जनमेजय!] विदुरजीकी बात समाप्त होनेपर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले अर्थशास्त्रविशारद अर्जुनने युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर कहा॥ १०॥
अर्जुन उवाच
कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते।
कृषिर्वाणिज्यगोरक्षं शिल्पानि विविधानि च॥ ११॥
अर्जुन बोले—राजन्! यह कर्मभूमि है। यहाँ जीविकाके साधनभूत कर्मोंकी ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँतिके शिल्प—ये सब अर्थप्राप्तिके साधन हैं॥ ११॥
अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः।
न ह्यृतेऽर्थेन वर्तते धर्मकामाविति श्रुतिः॥ १२॥
अर्थ ही समस्त कर्मोंकी मर्यादाके पालनमें सहायक है। अर्थके बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते, ऐसा श्रुतिका कथन है॥ १२॥
विषयैरर्थवान् धर्ममाराधयितुमुत्तमम्।
कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥ १३॥
धनवान् मनुष्य धनके द्वारा उत्तम धर्मका पालन और अजितेन्द्रिय