गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextषड्जगीता
[षड्जगीता महाभारतके शान्तिपर्वमें विद्यमान है। इस गीताका मुख्य प्रतिपाद्य-विषय पुरुषार्थ-चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षकी तुलनात्मक विवेचना करके उसमें श्रेष्ठतमका अनुसन्धान करना है। धर्मराज युधिष्ठिरने पूर्वपक्षके रूपमें अपने चारों भाइयों तथा विदुरजीसे उनका मत जानकर फिर उत्तरपक्षके रूपमें अपना मत बताया है। फलतः इस छोटी-सी गीतामें जीवनके सभी पक्षोंसे सम्बद्ध तर्कोंका विश्लेषण भी है और निष्कर्षस्वरूप मोक्षप्राप्तिका गूढ उपाय (ज्ञान) भी बताया गया है। पाँचों पाण्डव और छठे महात्मा विदुरके विचार ग्रथित होनेसे इसे ‘षड्जगीता’ कहा गया है। इसी षड्जगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णीम्भूते युधिष्ठिरः।
पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातॄन् विदुरपञ्चमान्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—[हे जनमेजय!] यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिरने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजीसे प्रश्न किया—॥ १॥
धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता।
तेषां गरीयान् कतमो मध्यमः को लघुश्च कः॥ २॥
लोगोंकी प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और कामकी ओर होती है। इन तीनोंमें कौन सबसे श्रेष्ठ, कौन मध्यम और कौन लघु है?॥ २॥
कस्मिंश्चात्मा निधातव्यस्त्रिवर्गविजयाय वै।
संहृष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद् वक्तुमर्हथ॥ ३॥
इन तीनोंपर विजय पानेके लिये विशेषतः किसमें मन लगाना चाहिये?