गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- परमहंसगीता * १३९
जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलोंवाले
पापवृक्षों, इसी प्रकारकी दूषित लताओं और विषैले कुओंके समान
हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनोंके ही काममें
नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्देके समान हैं—उन कृपण
पुरुषोंका आश्रय लेता है॥ १२॥
एकदासत्प्रसङ्गान्निकृतमतिर्व्युदकस्त्रोतः स्खलनवदुभय-
तोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति ॥ १३ ॥
कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी
नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख
देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है॥ १३॥
यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि
पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति ॥ १४॥
जब दूसरोंको सतानेसे उसे अन्न भी नहीं मिलता, तब वह
अपने सगे पिता-पुत्रोंको अथवा पिता या पुत्र आदिका एक
तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खानेके लिये
तैयार हो जाता है॥ १४॥
क्वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं
शोकाग्निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५ ॥
कभी दावानलके समान प्रिय विषयोंसे शून्य एवं परिणाममें
दुःखमय घरमें पहुँचता है तो वहाँ इष्टजनोंके वियोगादिसे उसके शोककी
आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्न होने
लगता है॥ १५॥
क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसापहृतप्रियतमधनासुःप्रमृ-
तक इव विगतजीवलक्षण आस्ते ॥ १६ ॥
कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय