गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना ८९
किये जानेवाले वेदाभ्यासके साथ पञ्चमहायज्ञ एवं देवतार्चन शीघ्र ही सभी पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो मोहवश अथवा आलस्यके कारण बिना देवार्चन किये ही भोजन करता है, उसे नाना प्रकारके कष्टदायक नरकोंमें जाकर सूकरकी योनिमें जन्म ग्रहण करना पड़ता है।
अब मैं अशौचका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करता हूँ। जो अपवित्र है, वह सदा पातकी है। अपवित्र व्यक्तियोंके संसर्गसे अशौच होता है और उनके संसर्गका परित्याग कर देनेसे शरीर पवित्र हो जाता है। हे द्विजोत्तम ! सभी विद्वान् ब्राह्मण दस दिनोंका अशौच मानते हैं। यह अशौच मृत्यु अथवा जन्म दोनोंमें होता है। दाँत निकलनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नान करनेसे अशौचकी निवृत्ति हो जाती है। उसके बाद चूडा (मुण्डन)-संस्कारपर्यन्त बालककी मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है।
उपनयन-संस्कारके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रियोंका अशौच होता है। उपनयन-संस्कारके बाद किसीका मरण होनेपर यथाविधान दस रात्रिका अशौच ब्राह्मणोंको होता है।
क्षत्रिय बारह दिनोंमें, वैश्य पंद्रह दिनोंमें तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। क्योंकि इनको यथाक्रम बारह दिनका, पंद्रह दिनका एवं एक मासका अशौच होता है। संन्यासियोंको अशौच नहीं लगता है। गर्भस्राव होनेपर गर्भमासके अनुसार जितने मासका गर्भ हो, उतनी रात्रिका अशौच होता है। (अर्थात् एक मासका गर्भस्राव होनेपर एक रात्रि, दो मासका गर्भस्राव होनेपर दो रात्रिका अशौच होता है। इसी क्रममें अन्य मासोंकी गणना करके अशौचकी रात्रियोंका निश्चय करना चाहिये।) (अध्याय ५०)
दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं सर्वोत्तम दानधर्मके विषयमें कह रहा हूँ—
सत्पात्रमें श्रद्धापूर्वक किये गये अर्थ (भोग्यवस्तु)-का प्रतिपादन (विनियोग) दान कहलाता है—ऐसा दानधर्मवित्-जनोंका कहना है। यह दान इस लोकमें भोग और परलोकमें मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मनुष्यको चाहिये कि वह न्यायपूर्वक ही अर्थका उपार्जन करे, क्योंकि न्यायसे उपार्जित अर्थका ही दान-भोग सफल होता है।
अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह—ये तीनों ब्राह्मणोंकी वृत्ति (आजीविका) हैं। उनके लिये कुसीद अर्थात् सूदखोरी, कृषिकर्म तथा वाणिज्य अथवा क्षत्रियवृत्ति (युद्धादि कृत्य) त्याज्य है। उक्त सद्वृत्तिसे प्राप्त हुआ धन यदि सुयोग्य पात्रोंको दिया जाता है तो उसीको दान कहा जाता है। यह नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल—चार प्रकारका कहा गया है।
फलकी अभिलाषा न रखकर प्रत्युपकारकी भावनासे रहित होकर ब्राह्मणको प्रतिदिन जो दान दिया जाता है, वह नित्यदान है। अपने पापोंकी शान्तिके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंके हाथोंपर जो धन दिया जाता है, सत्पुरुषोंके द्वारा अनुष्ठित ऐसा दान नैमित्तिक दान है। संतान, विजय, ऐश्वर्य और स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छासे जो दान किया जाता है, उसको धर्मवेत्ता ऋषिगण काम्य दान कहते हैं। ईश्वरकी प्रसन्नताको प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मवित्-जनोंको सत्त्ववृत्तिसे युक्त चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, वह विमल दान है। यह दान कल्याणकारी है।
ईखकी हरी-भरी फसलसे युक्त या यव-