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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 92
८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी महाराज! स्वायम्भुव मनु आदि शास्त्रकारोंके द्वारा पूज्य तथा सृष्टि, स्थिति और प्रलय करनेवाले भगवान् हरिकी पूजा ब्राह्मणादि चारों वर्ण अपने-अपने धर्मके अनुसार करते हैं। मैं पृथक्-पृथक् रूपसे उनके धर्मोंको कह रहा हूँ। आप उसे सुनें।

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन—ये छः कर्म ब्राह्मणके धर्म हैं। दान, अध्ययन तथा यज्ञ—ये क्षत्रिय एवं वैश्यके साधारण धर्म हैं। इसके अतिरिक्त दण्ड क्षत्रियके लिये और कृषि करना वैश्यके लिये विशेष धर्म स्वीकार किया गया है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म है। शिल्पकारी उनकी आजीविका है। धर्मानुसार वे पाकयज्ञ-संस्थाका निर्वहन भी कर सकते हैं।

भिक्षाचरण, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, संध्या तथा अग्नि-कार्य—ये ब्रह्मचारियोंके धर्म हैं।

चारों आश्रमोंके दो भेद माने गये हैं। इसके अनुसार ब्रह्मचारीके उपकुर्वाण तथा नैष्ठिक—ये दो भेद हैं। जो द्विज विधिवत् वेदादिका अध्ययन करके गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट हो जाता है वह उपकुर्वाण है। जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें निवास करते हुए वेदाध्ययन करते रहते हैं—ब्रह्मतत्पर होते हैं, उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारीके नामसे जानना चाहिये।

हे द्विजश्रेष्ठ! अग्निकार्य, अतिथिसेवा, यज्ञ-दान और देवार्चन—ये सभी गृहस्थोंके संक्षिप्त धर्म हैं। गृहस्थके साधक और उदासीन दो प्रकार हैं। जो गृहस्थ परिवारके भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह साधक है। जो गृहस्थ पितृऋण, देवऋण और ऋषिऋण—इन तीनोंसे मुक्त होकर पत्नी-धनादिका भी त्याग करके एकाकी धर्माचरण करता हुआ विचरण करता रहता है, वह उदासीन गृहस्थ है। उसीको मौक्षिक भी कहते हैं।

भूमिशयन, फल-मूलका आहार, वेदाध्ययन, तप और अपनी सम्पत्तिका यथाधिकार यथोचित विभाग—ये सभी वानप्रस्थके धर्म हैं। जो वानप्रस्थ अरण्यमें तपश्चरण करता है, देवार्चन और उन्हें आहुति प्रदान करता है तथा स्वाध्यायमें सदैव अनुरक्त रहता है, वह वानप्रस्थ तापसोत्तम कहा जाता है। ऐसे ही जो वानप्रस्थ तपके द्वारा शरीरको अत्यन्त क्षीण करके ईश्वरके ध्यानमें सदा निमग्न रहता है, वह वानप्रस्थाश्रममें रहता हुआ भी संन्यासीके रूपमें जाना जाता है।

जो भिक्षु (संन्यासाश्रमी) नित्य योगाभ्यासमें अनुरक्त होकर ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयासरत एवं जितेन्द्रिय बना रहता है, उसको पारमेष्ठिक संन्यासी कहते हैं। जो सदैव आत्मतत्त्वानुसंधानमें प्रेम रखनेवाले हैं, नित्य तृप्त हैं, जो संयम-नियमसे रहते हैं, ऐसे महामुनि योगी भिक्षु कहे जाते हैं। भिक्षाचरण, वेदाध्ययन, मौनावलम्बन, तप, ध्यान, सम्यक्-ज्ञान और वैराग्य—ये भिक्षुक (संन्यासाश्रमी)-के सामान्य धर्म माने गये हैं।

पारमेष्ठिक संन्यासी तीन प्रकारके हैं—ज्ञानसंन्यासी, वेदसंन्यासी एवं कर्मसंन्यासी। योगीके भी तीन प्रकार हैं—जिन्हें भौतिक, (क्षत्र) एवं अन्त्याश्रमी योगी कहते हैं। ये तीनों योगमूर्तिस्वरूप परमात्माका आश्रयकर स्थित रहते हैं।

इन योगियोंकी पृथक्-पृथक् ब्रह्मभावनाएँ होती हैं। प्रथम प्रकारकी ब्रह्मभावना भौतिक योगीमें रहती है। दूसरी (मोक्ष) भावना क्षत्र योगीमें रहती है, इसीको अक्षर भावना कहते हैं। तीसरी भावनाको