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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 89

काण्ड ]
देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
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द्वारा एकत्रित की गयी मिट्टी उस देवमूर्तिको समर्पित करे और बिल्व, गूलर, पीपल, वट, पलाशद्वारा निर्मित पञ्चकषायको लेकर 'ॐ यज्ञायज्ञेति०' मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराये। तत्पश्चात् पञ्चगव्यसे स्नान कराकर सहदेवी, बला, शतमूली, शतावरी, घृतकुमारी, गुडूची, सिंही तथा व्याघ्री—इन औषधियोंसे युक्त जलसे 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रद्वारा स्नान कराये। तदनन्तर 'ॐ याः फलिनीति०' मन्त्रके द्वारा फल-स्नान करानेका विधान है।

तत्पश्चात् 'ॐ द्रुपदादिवेति०' मन्त्रसे विद्वानोंको उद्वर्तन-कृत्य करना चाहिये। अनन्तर उत्तर आदि दिशाओंमें क्रमशः चार कलशोंका स्थापन करना चाहिये और उन कलशोंमें विविध रत्न, सप्तधान्य<sup>१</sup> और शतपुष्पिका<sup>२</sup> नामक औषधिका निक्षेप करना चाहिये। इसके अतिरिक्त उन चारों कलशोंमें चारों समुद्र एवं चारों दिशाओंके अधिष्ठाता देवोंका आवाहन करना चाहिये। साथ ही दूध, दही, क्षीरोदक एवं घृतोदकसे चारों कलशोंको पृथक्-पृथक् परिपूर्ण करके 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे दुग्धकुम्भ, 'दधिक्राव्णो०' मन्त्रसे दधिकुम्भ, 'या ओषधी०' इस मन्त्रसे क्षीरोदककुम्भ तथा 'तेजोसि०' मन्त्रसे घृतकुम्भको अभिमन्त्रित करना चाहिये। अभिमन्त्रित इन चारों कलशोंको चार समुद्रोंका प्रतिनिधि समझते हुए इनके द्वारा देवप्रतिमाको स्नान कराना चाहिये।

इस प्रकार स्नान-सम्पन्न उस देवप्रतिमाको सुन्दर वेश-भूषासे अलंकृत करके गुग्गुलका धूप प्रदान करे। तत्पश्चात् पुनः कुम्भोंमें पृथ्वीपर विद्यमान सभी तीर्थों, नदियों तथा सागरोंका विन्यास करना चाहिये। उन कुम्भोंको 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उनसे पुनः उस देवप्रतिमाका अभिषेक करे। जो व्यक्ति अभिषेकके अवशिष्ट जलसे स्नान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

समुद्रके प्रतिनिधिस्वरूप उन कुम्भोंसे उस देवमूर्तिका अभिषेक-कृत्य सम्पन्न होनेके पश्चात् अर्घ्य प्रदान करके 'ॐ गन्धद्वारेति०' मन्त्रसे सुगन्धित चन्दनादि पदार्थोंद्वारा अनुलेप करे। साथ ही शास्त्रोंमें विविध वेदमन्त्रोंसे देवमूर्ति-न्यासकी प्रक्रिया भी सम्पन्न करे। तत्पश्चात् 'ॐ इमं वस्त्रेति०' मन्त्रके द्वारा वस्त्रोंसे मूर्तिको आच्छादित करे। उसके बाद 'ॐ कविहाविति०' मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस प्रतिमाको सुन्दर मण्डपमें ला करके 'ॐ शम्भवायेति०' मन्त्रसे शय्यापर स्थापित करे। तदनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०' मन्त्रका उच्चारणकर समस्त पूजाविधिको सब प्रकारसे परिपूर्ण करे। तत्पश्चात् वहींपर बैठकर परमतत्त्वका ध्यान करते हुए आचार्यको शास्त्रीय विधानके अनुसार मन्त्रन्यास करना चाहिये। मन्त्रन्यासकी प्रक्रिया मन्त्रशास्त्रोंमें बतायी गयी है। इस न्यासके बाद मण्डपमें प्रतिष्ठापित देवप्रतिमाको वस्त्रसे आच्छादित करना चाहिये और उसकी यथाविधि पुनः पूजा भी करनी चाहिये। शास्त्रीय विधिके अनुसार जो देवताको समर्पित करना है, वह उनके पादमूलमें समर्पित कर देना चाहिये। इसके अतिरिक्त देवताके शिरोभागमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित, स्वर्णसे युक्त एवं प्रणवसे अंकित कलश स्थापित करना चाहिये।

तदनन्तर कुम्भके सन्निकट बैठकर आचार्य वेदमन्त्रोच्चारके साथ अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर पूर्वदिशामें ऋग्वेदवेत्ता ऋत्विक् कुण्डके समीप बैठकर श्रीसूक्त तथा पवमान आदि सूक्तोंका पाठ करे।

कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित अध्वर्यु अर्थात् यजुर्वेदवेत्ता आचार्य रुद्रसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पारायण करे। कुण्डके पश्चिममें बैठा हुआ उद्गाता सामवेदीय


१-जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, साँवा—इन धान्योंका समूह सप्तधान्य कहलाता है।
२-शतपुष्पिका सौंफ या वनसौंफको कहते हैं।