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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 87 of 634

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काण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि ७७


विधिसे हवन करे। कुछ लोग मण्डपके ईशानकोणकी भूमिको गायके गोबर या स्वच्छ मिट्टीसे लीपकर उसमें होम करते हैं।

मण्डपमें लगे तोरणोंके समीप ही पूर्वाद्कि दिशाओंमें चार द्वारोंका निर्माण करवाना चाहिये। मण्डपके तोरणस्तम्भ न्यग्रोध (वट), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), बिल्व, पलाश, खदिर (खैर) काष्ठसे निर्मित होने चाहिये। प्रत्येक तोरणस्तम्भका परिमाप पाँच हाथ होना चाहिये और प्रत्येक स्तम्भको वस्त्र-पुष्पादिसे अलंकृत करना चाहिये तथा उसके निचले भागको एक हाथ नापकर पृथ्वीमें गाड़ देना चाहिये। शेष चार हाथ परिमाणका भाग ऊपर रखे। इसी प्रकार उन्हें मण्डपके चारों ओरकी दिशाओंमें स्थापित करवाना चाहिये।

मण्डपके पूर्वी द्वारपर मृगेन्द्र, दक्षिणी द्वारपर हयराज, पश्चिमी द्वारपर गोपति तथा उत्तरी द्वारपर देवशार्दूलका न्यास करे। पहले ‘अग्निमीळे०’ इस मन्त्रसे पूर्व द्वारकी दिशामें मृगेन्द्रका न्यास करे। तदनन्तर ‘ईषेत्वेति च०’ इस मन्त्रसे दक्षिण द्वारकी दिशामें हयराजका, ‘अग्न आयाहि०’ इस मन्त्रसे पश्चिम द्वारकी दिशामें गोपतिका और ‘शं नो देवी०’ मन्त्रसे उत्तर द्वारकी दिशामें देवशार्दूलका न्यास करना चाहिये।

मण्डपकी पूर्व दिशामें मेघवर्णके समान श्याम, अग्निकोणमें धूम्रवर्ण, दक्षिण दिशामें कृष्णवर्ण, नैर्ऋत्यकोणमें धूसरवर्ण*, पश्चिम दिशामें पाण्डुरवर्ण, वायुकोणमें पीतवर्ण, उत्तर दिशामें रक्तवर्ण, ईशानकोणमें शुक्लवर्ण तथा मण्डपके मध्यभागमें अनेक वर्णवाली पताकाको स्थापित करे।

‘इन्द्रविद्येति०’ इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें इन्द्र, ‘संसुप्ति०’ इस मन्त्रसे अग्निकोणमें अग्नि, ‘यमोनाग०’ इस मन्त्रसे दक्षिणमें यम, ‘रक्षोहणावेति०’ मन्त्रसे (नैर्ऋत्यमें निर्ऋति) पश्चिममें वरुण तथा ‘ॐ वातेति०’ मन्त्रसे वायव्यमें वायुदेवका अभिषेक करके उत्तरमें ‘ॐ आप्यायस्वेति०’ मन्त्रसे कुबेरकी पूजा करे। ‘ॐ तमीशान०’ इस मन्त्रसे ईशान दिशामें ईशान और मण्डपके मध्यभागमें ‘ॐ विष्णोर्लोकेति०’ मन्त्रसे विष्णुका पूजन करना चाहिये।

प्रत्येक तोरणके समीप दो-दो कलश स्थापित करनेके पश्चात् वस्त्र तथा उपवस्त्रसे आच्छादित, चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अलंकृत, पुष्प, वितान एवं अन्यान्य पूजा-उपचारोंसे सुशोभित दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये।

‘ॐ त्रातारमिन्द्र०’ मन्त्रसे इन्द्र, ‘ॐ अग्निर्मूर्धा०’ मन्त्रसे अग्नि, ‘ॐ अस्मिन्वृक्ष०’ मन्त्रसे निर्ऋति, ‘ॐ किं चे दधातु०’ मन्त्रसे वरुण, ‘ॐ आचत्वा०’ मन्त्रसे कुबेर, ‘ॐ इमा रुद्रेति०’ मन्त्रसे रुद्र आदि दिक्पालोंकी पूजा करके विद्वान् आचार्यको चाहिये कि वह वायव्यकोणमें होमद्रव्य एवं अन्य पूजामें प्रयुक्त वस्तुओंको स्थापित करे।

तदनन्तर वह गुरु वहाँ रखी गयी श्वेत शंखादिक शास्त्र-विहित समस्त वस्तुओंपर एक बार दृष्टिपात कर ले, ऐसा करनेसे निश्चित द्रव्योंकी शुद्धि हो जाती है।

तत्पश्चात् हृदयादि षडङ्गोंका न्यास व्याहृति और प्रणवमन्त्रसे संयुक्त करके क्रमशः—(ॐ हृदयाय नमः, ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्, ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ भूर्भुवः स्वः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् मन्त्रका उच्चारण करते हुए) हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र, करतल


* पीलापनके साथ शुक्लवर्ण पाण्डुरवर्ण है और थोड़ा कम पाण्डुरवर्ण धूसरवर्ण है।