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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 84 of 634

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Page 84

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संक्षिप्त गरुडपुराण

[ आचार-

प्रासाद-लक्षण

श्रीसूतजीने पुनः कहा - हे शौनक ! अब मैं

प्रासाद-निर्माण एवं उसके लक्षणोंके विषयमें कह

रहा हूँ। आप सुनें।

सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्की देख-रेखमें

चारों दिशाओंमें चौंसठ-चौंसठ पद परिमापका

एक चतुष्कोण भूखण्ड तैयार करना चाहिये।

जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण-भूमिमें दीवालका

निर्माण करे। साथ ही चारों दिशाओंमें कुल बारह

द्वार (वारादरी) बनाये जायँ।

प्रासादकी ऊँचाईके परिमाणको अर्थात्

पृथ्वीतलपर प्रासादका बनाया गया ऊँचा जो

धरातल है, उसको प्रासादिक जंघा (कुर्सी) कहते

हैं। भवनकी यह जंघा मानव-जंघाकी अपेक्षा ढाई

गुना अधिक होनी चाहिये। उसके ऊपर निर्मित

होनेवाले गर्भभागके विस्तार-परिमापको शुक्रांघ्रि

कहते हैं। गर्भभागको पुनः तीन अथवा पाँच

भागोंमें विभक्त करना चाहिये और शुक्रांघ्रिके

द्वारकी ऊँचाई शिखर-भागकी आधी करनी

चाहिये। चार शिखर बनाकर उसके तीसरे भागपर

वेदि-बन्धन करे। उसके चतुर्थ भागपर पुनः प्रासादके

कण्ठ-भागका निर्माण करना चाहिये।* अथवा

भवनका निर्माण करनेके लिये भूमिखण्डको समान

सोलह भागोंमें विभक्त करके उस सोलहवें भागके

चतुर्थ भागके मध्यमें गर्भगृहका निर्माण करवाये।

बचे हुए बारह भागमें भित्ति (दीवाल) - का निर्माण

करे। चतुर्थ भागकी ऊँचाईके अनुसार ही अन्य

भित्तियोंकी ऊँचाईका परिमाण निश्चित करना चाहिये।

भित्तिकी ऊँचाईके मानकी अपेक्षा शिखरकी ऊँचाई

दो गुनी हो। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले

प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर-भागकी ऊँचाईके

मानका चतुर्थांश होना चाहिये।

बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें

चारों दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार

रखें। गर्भगृहकी चतुर्दिक् भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका

पाँच भाग करके उसके मध्यके पाँचवें भागमें द्वार

लगाना चाहिये। ऐसा ही गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका

मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित किया है।

गर्भगृहके समान ही उसके अग्रभागमें मुखमण्डप

बनाना चाहिये। यह प्रासादका सामान्य लक्षण

कहा गया है। अब मैं लिङ्गनिर्माणके परिमाणको

कह रहा हूँ।

हे शौनक ! लिङ्गके परिमाणके अनुसार उसकी

पीठका निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना

चारों ओर पीठका गर्भभाग हो। पीठगर्भके अनुसार

ही उसकी भित्ति तथा उसके विस्तारके अर्धपरिमाणमें

उस लिङ्गपीठका जंघाभाग निर्मित करे।

हे शौनक ! जंघाभागके परिमाणकी अपेक्षा

द्विगुणित ऊँचा शिखर होना चाहिये। पीठ और

गर्भभागके मध्य जो परिमाण हो, उस परिमाणके

अनुसार शुक्रांघ्रिभाग निर्मित होता है। द्वारनिर्माणके

समय पहले जैसा कहा जा चुका है, शेष कार्य

वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण बताया जा चुका

है। अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छः

फुट) - का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुसे आठवाँ

हिस्सा होता है। स्वेच्छानुसार इसका दुगुना विस्तार

हो सकता है।

द्वारके सदृश पीठके मध्यभागको छिद्रयुक्त ही

रखना चाहिये। पादिक, शेषिक तथा भित्तिद्वार

परिमाणके अनुसार ही उसके अर्ध-अर्ध परिमाणकी

दूरीपर निर्मित करे। उस गर्भभागके विस्तारके

समान ही मण्डपके जंघाभागका निर्माण करके उस

जंघाभागके द्विगुणके परिमाणमें ऊँचे शिखरभागको

  • चारों शिखरोंके मध्यमें ऊपरके हिस्सेको कण्ठभाग कहते हैं।