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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 78 of 634

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Page 78

६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

आवाहितोऽसि देवेश पूजार्थं परमेश्वर॥
तत्प्रभातेऽर्चयिष्यामि सामग्र्याः संनिधौ भव।
(४३। २८-२९)
हे परमेश्वर! देवदेवेश्वर! आप यहाँपर पूजाके लिये आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीसे प्रभातकालमें मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी संनिधि यहाँ बनी रहे।

एक रात्रि या तीन रात्रितक पवित्रकको अधिवासितकर स्वयं रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल भगवान् केशवका पूजन करे और निर्मित पवित्रकोंको उन देवको अर्पित करे। पवित्रकको धूपसे धूपित करके मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।

गायत्री-मन्त्रसे पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव-पूजन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दे—
विशुद्धग्रन्थिकं रम्यं महापातकनाशनम्।
सर्वपापक्षयं देव तवाग्रे धारयाम्यहम्॥
(४३। ३३)
हे देव! यह पवित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता हूँ। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना चाहिये—
पवित्रं वैष्णवं तेजः सर्वपातकनाशनम्॥
धर्मकामार्थसिद्धयर्थं स्वकण्ठे धारयाम्यहम्।
(४३। ३४-३५)
[हे देव!] यह विष्णु-तेजःस्वरूप, सर्वपाप-विनाशक पवित्रक है। मैं धर्म, काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये इसे अपने कण्ठमें धारण करता हूँ। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे—
वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि।
तद्वत् पवित्रं तन्तूनां मालां त्वं हृदये धर॥
(४३। ४१)
हे देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कौस्तुभ विराजते हैं, उसी प्रकार तन्तुओंकी बनी हुई यह माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें।

इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विसर्जन करे—
सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मया।
व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जितः॥
(४३। ४३)
हे पवित्रक! मैंने इस सांवत्सरी पूजाको विधिवत् सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप विष्णुलोकको पधारें। (अध्याय ४३)


ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! भगवान्‌की पवित्रक आदिसे पूजाकर ब्रह्मका ध्यान करके साधक हरि बन जाता है (मेरा स्वरूप हो जाता है)। अब मैं मायाजालको नष्ट करनेवाले ब्रह्मके ध्यानका वर्णन करता हूँ। आप सुनें—

ब्रह्मके ध्यानके लिये प्रवृत्त प्राज्ञ (विशेष साधक) अपनी वाणी एवं मनको नियन्त्रितकर अपनी आत्मामें ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका यजन करे और जिस प्राज्ञको यह उत्कट इच्छा हो कि मैं अपनी आत्मामें ब्रह्मका दर्शन (जीवब्रह्मका अभेददर्शन) करूँ, उसे महद्ब्रह्म (प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्म)-में ज्ञानकी भावना (ब्रह्म एवं निर्विषय-नित्य-ज्ञानमें अभेदभाव) करनी चाहिये।

ब्रह्मका ध्यान ही समाधि है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस रूपमें सदा स्वयंकी अवस्थिति ही ब्रह्मका ध्यान है। स्वयंसे अभिन्न ब्रह्म देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,