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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 76
६६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

गीत, वाद्य, नृत्यसे महेश्वरको संतुष्टकर छत्र आदि समर्पित करना चाहिये। मुद्राका प्रदर्शन करके आवाहित देवके रूपका ध्यान, जप तथा तादात्म्यभावसे मूलमन्त्रद्वारा जप और पूजाको समर्पित करे।
इस प्रकार विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये विश्वावसु गन्धर्व तथा देवी कालरात्रि आदिकी उपासना करनी चाहिये। (अध्याय ३८—४१)

शिवके पवित्रारोपणकी विधि

**श्रीहरिने कहा—**हे महादेव ! अमङ्गलका नाश करनेवाले भगवान् शिवके पवित्रारोपणके पूजा-विधानको कह रहा हूँ। यह पूजा आषाढ़, श्रावण, माघ या भाद्रपद मासमें होती है। पवित्रारोपणकी इस पूजामें पवित्रक (जनेऊ) बनानेके लिये सत्ययुग आदिके भेदसे सूत्र-धारणका नियम है। जैसे—सत्ययुगमें सुवर्णके, त्रेतामें रजतके, द्वापरमें ताम्रके और कलियुगमें कन्याके हाथसे बनाये गये कपासके सूत्र (सूत)-को ग्रहण करना चाहिये। सूत्रको लेकर पहले उसे तिगुना करके पुनः उसका तिगुना करना चाहिये। इस प्रकार नवगुणित सूत्रसे पवित्रकका निर्माण करके वामदेवमन्त्रसे उसमें ग्रन्थि देनी चाहिये। तदनन्तर हे शिव ! सद्योजातमन्त्रसे उसका प्रक्षालन करके अघोरमन्त्रसे उसका शोधन करना चाहिये। तत्पुरुषमन्त्रसे उसमें बन्धन तथा ईशानमन्त्रसे तन्तुदेवताओंको सुगन्धित धूप दिखाना चाहिये।

तन्तुओंमें क्रमशः—ॐकार, चन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, नाग, शिखिध्वज, सूर्य, विष्णु और शिवका वास है—ये नौ तन्तुके देवता हैं। हे रुद्र ! उस पवित्रकमें एक सौ आठ या पचास अथवा पच्चीस तन्तु होने चाहिये। ये क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ हैं। पवित्रकमें दस ग्रन्थिका मान है। अतएव प्रत्येक चार अंगुल या दो अंगुल अथवा एक अंगुलका अन्तर देकर एक-एक ग्रन्थिका बन्धन देना चाहिये। हे सदाशिव ! उन ग्रन्थियोंके नाम इस प्रकार हैं—प्रकृति, पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जह्याया, विजया, रुद्रा, अजिता, मनोन्मनी तथा सर्वमुखी।

हे शिव ! ग्रन्थिबन्धनके पश्चात् उस पवित्रकको कुंकुम, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थोंसे रञ्जित करना चाहिये। उस गन्धानुरञ्जित पवित्रकको देवको समर्पित कर देना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि सभी क्रियाओंको करके 'हे देवेश ! हे महेश्वर ! आप अपने गणोंके साथ यहाँपर आमन्त्रित हैं। प्रातःकाल यहींपर आपका पूजन करूँगा अतः आप यहाँपर उपस्थित रहें।'-इस प्रकार देवताको निमन्त्रित करे और गीत-वाद्यादिके द्वारा रात्रि-जागरण करे। प्रातः उन आमन्त्रित पवित्रकोंको भगवान् महेश्वरके पास स्थापित करके चतुर्दशी तिथिमें स्नान करे और सबसे पहले सूर्य तथा रुद्रकी पूजा करे, तदनन्तर ललाटस्थ विश्वरूपका ध्यानकर अपने आत्मस्वरूपकी पूजा करे।

तत्पश्चात् अस्त्रमन्त्रसे प्रोक्षित और हृदयमन्त्रके द्वारा अर्पित तथा संहितामन्त्रोंसे धूपित पवित्रकोंको भगवान्को समर्पित करना चाहिये। सबसे पहले शिवतत्त्व और विद्यातत्त्वकी पूजा करके आत्मतत्त्व और देवतत्त्वका पूजन इन निर्धारित मन्त्रोंसे करे—

'ॐ हौं हौं शिवतत्त्वाय नमः, ॐ हीं (हीः) विद्यातत्त्वाय नमः, ॐ हां (हौः) आत्मतत्त्वाय नमः, ॐ हां हीं हूं क्षौं सर्वतत्त्वाय नमः।'

भगवान् महेश्वरको पवित्रक विधिपूर्वक निवेदितकर स्वयं भी धारण करना चाहिये।
(अध्याय ४२)