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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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काण्ड ] गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि ६१

है। विद्यास्वरूप, विद्याप्रदायक उन देवके लिये बार-बार नमन है। शान्तस्वरूप, त्रिगुणात्मक, सुर तथा असुरोंका निग्रह करनेवाले, सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाले, सर्वलोकाधिपति ब्रह्मस्वरूप उन देव हयग्रीवके लिये नमस्कार है। महेश्वरके लिये भी वन्दनीय, शङ्ख-चक्रधारी, जगत्के आदि कारण, परम उदार तथा सभी प्राणियोंका हित करनेवाले देवके लिये नमस्कार है। त्रिगुणात्मक, त्रिगुणातीत, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप, जगत्की सृष्टिके कर्त्ता, संहर्त्ता, देवेश्वर तथा सर्वव्यापक उन भगवान् हयग्रीवको बारम्बार नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके अपने हृदयकमलके मध्य शङ्ख, चक्र और गदाको धारण करनेवाले, करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान्, सर्वाङ्गसुन्दर, अविनाशी महेश्वरके भी ईश, देवाधिदेव, परमात्मा हयग्रीवका ध्यान करना चाहिये।

हे शङ्कर ! इस प्रकार मैंने भगवान् हयग्रीवकी पूजा-विधिका वर्णन किया। परम भक्तिपूर्वक जो इसका पाठ करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। (अध्याय ३४)


गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि

श्रीहरिने कहा—हे शङ्कर ! अब मैं गायत्रीदेवीके [पूजनमें] न्यासादिका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, मस्तक ब्रह्मा और शिखा रुद्र हैं। ये विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हैं। ये विनियोग-कालमें एकनेत्रा हैं। इनका प्रादुर्भाव कात्यायन-गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा ये पृथिवीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीके स्वरूपको इस प्रकार जानकर [गायत्री-मन्त्रका] बारह लाख जप करना चाहिये।

इस मन्त्रके त्रिपद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छः अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपदा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया है<sup>१</sup>।

जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।

पैरके अंगुष्ठ-भागमें, गुल्फ<sup>२</sup>के मध्यमें, दोनों जंघाओं, दोनों जानुओं<sup>३</sup>, ऊरु<sup>४</sup>-भाग, गुह्यस्थान, अण्डकोष, नाडी, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और भौंहों तथा मस्तकमें इस (गायत्री)-मन्त्रका न्यास करके क्रमशः—पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें इनका न्यास करना चाहिये।

हे रुद्र ! इन गायत्रीदेवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों)-को कह रहा हूँ। क्रमशः इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निसदृश, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युतप्रभ, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पद्मरागतुल्य, शङ्खवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसवके समान रक्तकृष्णमिश्रित, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।

गायत्रीदेवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे


<sup>१</sup> जिस गायत्री-मन्त्रका जप किया जाता है, वह त्रिपदा गायत्री कहलाती है। 'परोरजसेऽसावदोम्०' यह गायत्रीका चतुर्थ पाद है। इस चतुष्पदा गायत्रीका प्रयोग सूर्योपस्थान, पूजन आदिमें होता है।
<sup>२</sup> गुल्फ (पैरकी घुट्टी) पाँवोंकी गाँठें।
<sup>३</sup> जानु (घुटना)।
<sup>४</sup> ऊरु—घुटनेके ऊपरका भाग।