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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायणस्वरूपसे पाँच रूपों (तत्त्वों)-में स्थित हैं।

हे वृषध्वज ! जनार्दन विष्णुके उक्त पञ्चरूपोंके वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं—

ॐ अं वासुदेवाय नमः, ॐ आं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः, ॐ अः अनिरुद्धाय नमः, ॐ ॐ नारायणाय नमः।

—ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओंके वाचक हैं, जो सभी पातक, महापातकोंके विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगोंको दूर करनेवाले हैं। अब मैं आपसे मङ्गलमय पञ्चतत्त्वार्चन-विधिको कह रहा हूँ। हे शिव ! उसको जिस विधिसे और जिन मन्त्रोंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।

—इन पाँच देवोंकी पूजामें सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर पूजा-गृहमें प्रवेश करके विद्वान् साधकको चाहिये कि वह आचमन करके मनोऽनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और—'अं क्षौं रम्'—इन मन्त्रोंसे शोषणादि क्रिया करे।

वे वासुदेव कृष्ण जगत्‌के स्वामी, पीतवर्णके कौशेय (रेशमी) वस्त्रोंसे विभूषित, सहस्रों सूर्यकी किरणोंके समान तेजःस्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्णका अपने हृदय-कमलमें ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् संकर्षणका ध्यान करे। उसके बाद यथाक्रम प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा श्रीमन्नारायणके स्वरूपका ध्यान करके उन देवाधिदेवसे प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवोंका ध्यान करके मूल मन्त्रके द्वारा दोनों हाथोंसे व्यापक रूपमें करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यासके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। हे महादेव ! सुव्रत ! उन न्यास एवं पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—

'ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ आधारशक्त्यै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ वं वासुदेवाय परब्रह्मणे शिवाय तेजोरूपाय व्यापिने सर्वदेवाधिदेवाय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ ह्रियै नमः, ॐ पुष्ट्यै नमः, ॐ गीत्यै नमः, ॐ शक्त्यै नमः, ॐ प्रीत्यै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निर्ऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।'

तत्पश्चात् 'ॐ पद्माय नमः' ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलोंका निर्माण करके उस मण्डलमें इन्हीं मन्त्रोंसे देवोंका पूजन करना चाहिये।

मूल मन्त्रसे पाद्य आदिका निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर ! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उसे प्रभुको समर्पित कर दे।

तदनन्तर भगवान् वासुदेवका स्मरणकर इस स्तोत्रका पाठ करे—

ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥
प्रद्युम्नायादिदेवायानिरुद्धाय नमो नमः।

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