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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 631
काण्ड ]सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा६२१

शरीरका परित्यागकर आपकी पुत्रीके रूपमें पृथ्वीपर मैंने जन्म लिया है।

श्रीकृष्ण बोले—हे पक्षिन्! उस मित्रविन्दाने पृथ्वीपर रहनेके लिये वसुदेवकी बहिनके उदरमें सुमित्रा नामसे जन्म लिया। भागवतकथाके श्रवणसे ही वह भगवान् विष्णुको मित्रके रूपमें प्राप्त कर सकी है। इसी कारण उसका मित्रविन्दा यह नाम पड़ा है। हे खगराज! स्वयंवरमें अनेक राजाओंके मध्य भामिनी उस मित्रविन्दाने मेरे गलेमें जयमाला डाल दी और मैं समस्त राजाओंको परास्त कर मित्रविन्दाको साथ लेकर अपनी पुरी आ गया।

(अध्याय २०)


सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा

श्रीकृष्णने कहा—हे खगेश्वर! अब मैं कालिन्दीकी उत्पत्तिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें—विवस्वान् नामके सूर्यकी कालिन्दी नामवाली एक पुत्री उत्पन्न हुई।

हे पक्षिराज! उस कालिन्दीको यमुना तथा यमानुजाके नामसे भी कहा गया है। भगवान् कृष्णकी पत्नी बननेकी इच्छासे उसने विशिष्ट तप किया था। पूर्वजन्ममें अर्जित पापोंका अनुताप अर्थात् उनका शमन करना तप है। हे पक्षिराज! अब आप अनुतापके विषयमें सुनें—पूर्वजन्ममें जिसने भगवान् मुकुन्दके दिव्य मन्त्रोंका जप नहीं किया, हरिनामामृतका स्मरण नहीं किया, भगवान्‌के पादारविन्दोंकी वन्दना नहीं की, हरिके नैवेद्यको ग्रहण नहीं किया, सुन्दर गन्धसे युक्त पुष्पोंको मुरारिको अर्पित नहीं किया, भगवान्‌की भक्ति नहीं की, ऐसा सोच-सोचकर मनमें जो पश्चात्ताप होता है, दुःख होता है वह कहने लगता है—हे मुकुन्द! मैं इस पुत्र-मित्र-कलत्रादिसे युक्त संसारमें अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ, हे भगवन्! कब मैं आपके मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, मुझसे आपकी सेवा-पूजा नहीं हुई है, मेरा उद्धार कैसे होगा? हे हरे! मैं महान् पापी हूँ कब मुझे आपके दर्शन होंगे! हे प्रभो! मैंने अनन्त जन्मोंमें सांसारिक सम्बन्धोंके द्वारा अणुमात्र भी सुख नहीं प्राप्त किया और न तो मैं आपकी सेवा ही कर सका हूँ और न आपके भक्तजनोंकी संगति ही कर सका हूँ, हे मुरारे! मेरा शरीर कष्टसे जल रहा है। ऐसा अगतिक मैं अब आप मुकुन्दकी शरण छोड़कर और किसकी शरणमें जाऊँ? हे भगवन्! मुझपर दया कर मेरी रक्षा करें।'

श्रीकृष्णने पुनः कहा—हे पक्षिराज! इस प्रकारका पश्चात्ताप करना ही अनुताप है। इसका नाम तप भी है। हे पक्षिराज! सूर्यपुत्री उस कालिन्दीने भी इसी प्रकारका अनुताप करते हुए यमुनाके तटपर तपस्या की और श्रीहरिके ध्यानमें वह निमग्न हो गयी।

तत्पश्चात् हे पक्षिराज! एक दिन मैं अर्जुनके साथ यमुनाके तटपर गया। तप करती हुई उसको वहाँ देखकर मैंने अपने मित्र अर्जुनसे कहा कि हे पार्थ! आप शीघ्र ही उस कन्याके समीपमें जाकर पूछें कि 'वह किस कारणसे तप कर रही