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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 629 of 634

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Page 629

काण्ड ]
भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा
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भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज ! पूर्वजन्ममें विष्णुपत्नीने ही नलकी पुत्रीके रूपमें भद्रा नामसे शरीर धारण किया था। जो परम विष्णुभक्त थी, वह सभी प्रकारके भद्र गुणोंसे सम्पन्न थी, इसी कारण उसका भद्रा यह नाम पड़ा था। वह कन्या भगवान् कृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये नित्य उन्हें प्रणाम-निवेदन और उनकी प्रदक्षिणा किया करती थी। कन्याभावमें स्थित अपनी भद्रा नामक पुत्रीकी वैसी कठिन तपस्या देखकर पिता नलने कहा कि ‘हे नन्दिनी ! पुत्री ! भद्रे ! किसलिये तुम अपने शरीरको कष्ट दे रही हो ऐसा करनेसे तुम्हें कौन-सा फल मिल जायगा, उसे मुझे बताओ।’

भद्रा बोली—हे तात ! आप मेरे पिता हैं, भला मैं आपको क्या बता सकती हूँ। भगवान्‌को नमस्कार आदि क्रियाओंके फलको बतानेमें कौन समर्थ हो सकता है? फिर भी आप सुनें—‘हे तात ! करुणानिधान भगवान् विष्णु ही सदा मेरे स्वामी रहे हैं। मैं हरिके दासोंकी भी दासी हूँ।’ हे विष्णो ! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। मेरी रक्षा करें, ऐसा कहती हुई भद्राने दण्डवत्-रूपमें भूमिपर गिरकर अपने स्वामी नारायणको प्रणाम किया। पुनः भद्रा कहने लगी। हे तात ! भगवान् विष्णुको नित्य-निरन्तर प्रणाम करना चाहिये। जिस प्रकार वन्दना करनेसे वे देव प्रसन्न होते हैं, उस प्रकार वे पूजन करनेसे प्रसन्न नहीं होते। हे तात ! नामस्मरण अथवा प्रणाम-निवेदन तथा वन्दन करनेसे जिस प्रकारसे पापसे मुक्ति हो जाती है, उस प्रकारसे अन्य साधनोंसे नहीं होती।

हे तात ! भगवान् विष्णुको प्रणाम-निवेदन किये बिना जो लोग शरीरका पोषण करते हैं, उनका वह शरीर-पोषण व्यर्थ ही है। ऐसे लोगोंको नरकमें महान् दुःख भोगना पड़ता है। जो देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा नहीं करता उसे यमराज अत्यन्त त्रास देते हैं। जिनकी जिह्वा ‘हरि’, ‘कृष्ण’ इस प्रकारसे भगवान्‌के मङ्गलमय नामोंका नित्य कीर्तन नहीं करती है, ज्ञानीजनोंद्वारा उस जिह्वाको व्यर्थ ही कहा गया है।

हे तात ! काशीमें निवास करने अथवा प्रयागमें मरनेसे क्या लाभ ! अथवा युद्धमें वीरगति प्राप्त करनेसे अथवा यज्ञादिका अनुष्ठान करनेसे क्या लाभ है ! समस्त तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे अथवा शास्त्रके अध्ययनसे किस प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है? जिनकी जिह्वाके अग्रभागपर हरिनाम नहीं है, जिनके शरीरसे भगवान् विष्णुको नमन नहीं किया गया है, जिनके पैरोंने भगवान् विष्णुकी प्रदक्षिणा नहीं की है, ऐसे लोगोंका सब कुछ करना व्यर्थ ही है? ऐसा महान् लोगोंका कहना है।* अतः हे तात ! भगवान् विष्णुको नमन करना और उन्हें निरन्तर स्मरण रखना ही प्राणीका वास्तविक कार्य है। निश्चित ही यह मनुष्य-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है, किंतु दुर्लभ होनेपर भी वैसे ही नश्वर है, जैसे जलमें स्थित बुलबुला होता है। हे तात ! इस नश्वर शरीरका कोई भरोसा नहीं है, अतः जो समय प्राप्त है उसमें भगवान्‌को नमस्कार, वन्दन आदि करते रहना चाहिये। हे पिताजी ! आप भी ऐसा ही करें।


* काशीनिवासेन च किं प्रयोजनं किं वा प्रयागे मरणेन तात ॥
किं वा रणाग्रे मरणेन सौख्यं किं वा मखादैः समनुष्ठितेन । समस्ततीर्थ्यष्टनेन किं किमधीतशास्त्रेण सुतीक्ष्णबुद्ध्या ॥
येषां जिह्वाग्रे हरिनामैव नास्ति येषां गात्रैर्नमनं नापि विष्णोः । येषां पद्भ्यां नास्ति हरेः प्रदक्षिणं तेषां सर्वं व्यर्थमाहुर्महान्तः ॥
(२०।१०–१२)