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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 619

काण्ड ] देवताओंद्धारा नारायणकी स्तुति [ ६०९


सांसारिक देहानुरक्तिको नष्ट कर देता है, इतना ही नहीं वरन् जो घर, भार्या, पुत्र, पशु, धन-सम्पत्तिका व्यामोह, आसक्ति रहती है वह भी दूर हो जाती है।

हे अनन्तदेव! वेदोंसे प्रतिपादित जो आपका स्वरूप है उसे लक्ष्मी भी नहीं जानतीं, चतुर्मुख ब्रह्मा भी नहीं जानते हैं, वायुदेव भी नहीं जानते हैं, फिर मुझमें यह शक्ति कहाँ है कि मैं आपकी स्तुति कर सकूँ। इसलिये हे हरे! आप मेरी रक्षा करें।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर देवी सरस्वती चुप हो गयीं। तदनन्तर भारती ने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।

भारती ने कहा—हे ब्रह्म! हे लक्ष्मीश! हे हरे! हे मुरारे! जो आपके गुणोंमें नित्य श्रद्धा रखता है, वह उन गुणोंका गान करते हुए सांसारिक असत् विषयोंमें प्रवृत्त अपनी बुद्धिमें संसारके प्रति विराग उत्पन्न कर लेता है और उसकी आपमें दृढ़ भक्ति हो जाती है और इस भक्तिके बलपर हे देवदेव! आपकी प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है। हरिके प्रसन्न हो जानेसे भगवान्‌का भक्तके लिये प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है, इसलिये हे प्रभो! आपके गुणोंके कीर्तनमें मेरी रति बनी रहे, जब ऐसी अनुरक्ति पुरुषमें हो जाती है तो वह प्रीति समस्त सांसारिक दुःखोंको काट डालती है और परमानन्दस्वरूप फलकी प्राप्ति करा देती है। हरिके गुणोंकी जो स्तुति नहीं करते उन्हें पाप लगता है और उनका पुण्य भी क्षीण हो जाता है।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर भारती मौन हो गयीं। उसके बाद शेषने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए केशवसे इस प्रकार कहा—

शेषने कहा—हे वासुदेव! मैं आपके चरणोंके प्रभावको नहीं जानता। इसे न रुद्र जानते हैं और न गरुड ही जानते हैं, मैं तो बहुत ही न्यून हूँ। अतः शरण देकर मेरी रक्षा करें।

हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति करके शेष मौन हो गये। उसके बाद पक्षिराज गरुडने स्तुति करना आरम्भ किया।

गरुडने कहा—हे प्रभो! आपके चरणोंकी स्तुति मैं क्या कर सकता हूँ। मेरा मन तो आपके चरणकमलमें ही समर्पित है। मैं तो पक्षियोनिमें उत्पन्न हूँ। इस मुखसे आपकी स्तुति कैसे सम्भव है? आपके अनन्त गुणोंकी प्रशंसा करनेकी शक्ति भला मुझमें कहाँ है?

इस प्रकार विनयपूर्वक स्तुति कर गरुड मौन हो गये। इसके बाद रुद्र स्तुति करने लगे।

रुद्रने कहा—हे भूमन्! हे भगवन्! आपकी जैसी स्तुति होनी चाहिये वह मैं नहीं जानता। आपके कल्याणकारी चरणोंके मूलमें मेरी भक्ति बनी रहे। ईश! अपनेमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर रुद्रदेव शान्त हो गये। हे पक्षिश्रेष्ठ! तदनन्तर वारुणी, सौपर्णी तथा पार्वती आदि देवियोंने भी उन हरिकी बड़े ही भावभक्तिसे स्तुति कर उनकी शरण ग्रहण की।

श्रीकृष्णने पुनः कहा—हे खगेश्वर! अनन्तर इन्द्रने उनकी स्तुति करते हुए कहा—

हे देवदेव! आपके स्वरूपको हृदयमें जानते हुए भी जो मूढ स्तवनके लिये उत्सुक होता है, हे चक्रपाणि! बिना जाने भी तुम्हारी स्तुति करना यह आपका अनादर ही है; क्योंकि आपके यथार्थ स्वरूपको, गुणोंको वाणीके द्वारा व्यक्त करना सम्भव नहीं है, फिर भी आपकी स्तुति करनेमें आपके नामका उच्चारण होगा; अतः यह पुण्य फल तो देनेवाला ही होगा। ऐसा समझकर आपकी स्तुति की ही जाती है। हे प्रभो! जब रुद्रादि देव भी आपकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते तो मुझमें ऐसी सामर्थ्य कहाँ? इस प्रकार देवाधिदेव हरिकी स्तुति कर नतमस्तक हो अंजलि बाँधकर इन्द्र मौन हो गये।

देवी शचीने स्तुति करते हुए कहा—हे देव! वज्र, अंकुश, ध्वज तथा कमलसे चिह्नित आपके