Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 608 of 634

Read in context
Page 608
५९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

प्रभाते मलमूत्राभ्यां क्षुत्तृड्भ्यां मध्यगे रवौ।
रात्रौ मदननिद्राभ्यां बाध्यन्ते मूढमानवाः॥
स्वदेहधनदारादिनिरताः सर्वजन्तवः।
जायन्ते च म्रियन्ते च हा हन्ताज्ञानमोहिताः॥
तस्मात् सङ्गः सदा त्याज्यः स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
महद्भिः सह कर्तव्यः सन्तः सङ्गस्य भेषजम्॥
(४९। ५२—५६)
सत्संग और विवेक—ये दो प्राणीके मलरहित, स्वस्थ दो नेत्र हैं। जिसके पास ये दोनों नहीं हैं, वह मनुष्य अन्धा है। वह कुमार्गपर कैसे नहीं जायगा? अर्थात् वह अवश्य ही कुमार्गगामी होगा—
सत्सङ्गश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम्।
यस्य नास्ति नरः सोऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः॥
(४९। ५७)
अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मको माननेवाले सभी मानव दूसरेके धर्मको नहीं जानते हैं, किंतु वे दम्भके वशीभूत हो जायँ तो अपना ही नाश करते हैं। व्रतचर्यादिमें लगे हुए प्रयासरत कुछ लोगोंसे क्या बनेगा? क्योंकि अज्ञानसे स्वयं अपने आत्मतत्त्वको ढके हुए लोग प्रचारक बनकर देश-देशान्तरमें विचरण करते हैं। नाममात्रसे स्वयं संतुष्ट कर्मकाण्डमें लगे हुए मनुष्य तथा मन्त्रोच्चार एवं होमादिसे युक्त याज्ञिक यज्ञविस्तारके द्वारा भ्रमित हैं। मेरी मायासे विमोहित मूढ़ लोग शरीरको सुखा देनेवाले एकभक्त तथा उपवासादि नियमोंसे अपने पुण्यरूप अदृष्टकी कामना करते हैं।

शरीरकी ताड़ना मात्रसे अज्ञानीजन क्या मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं? क्या वामीको पीटनेसे महाविषधारी सर्प मर सकता है? यह कदापि सम्भव नहीं है। जटाओंके भार और मृगचर्मसे युक्त वेष धारण करनेवाले दाम्भिक ज्ञानियोंकी भाँति इस संसारमें भ्रमण करते हैं और लोगोंको भ्रमित करते हैं। लौकिक सुखमें आसक्त 'मैं ब्रह्मको जानता हूँ' ऐसा कहनेवाले, कर्म तथा ब्रह्म—इन दोनोंसे भ्रष्ट, दम्भी एवं ढोंगी व्यक्तिका अन्त्यजके समान परित्याग कर देना चाहिये। घरको वनके समान मानकर निर्वस्त्र और लज्जारहित जो साधु गधे अन्य पशुओंकी भाँति इस जगत्में घूमते रहते हैं, क्या वे विरक्त होते हैं? कदापि नहीं। यदि मिट्टी, भस्म तथा धूलका लेप करनेसे मनुष्य मुक्त हो सकता है तो क्या मिट्टी और भस्ममें ही नित्य रहनेवाला कुत्ता मुक्त नहीं हो जायगा? वनवासी तापसजन घास, फूस, पत्ता तथा जलका ही सेवन करते हैं, क्या इन्हींके समान वनमें रहनेवाले सियार, चूहे और मृगादि जीवजन्तु तपस्वी हो सकते हैं? जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त गङ्गा आदि पवित्रतम नदियोंमें रहनेवाले मेढक या मछली आदि प्रमुख जलचर प्राणी योगी हो सकते हैं? कबूतर, शिलाहार और चातक पक्षी कभी भी पृथ्वीका जल नहीं पीते हैं, क्या उनका व्रती होना सम्भव है। अतः ये नित्यादिक कर्म लोकरञ्जनके कारक हैं। हे खगेश्वर! मोक्षका कारण तो साक्षात् तत्त्वज्ञान है।

हे खगेश्वर! षड्दर्शनरूपी महाकूपमें पशुके समान गिरे हुए मनुष्य पाशसे नियन्त्रित पशुकी भाँति परमार्थको नहीं जानते। वेद-शास्त्रादिके महासमुद्रमें इधर-उधरसे अनुमान लगानेवाले इस षड्दर्शनरूपी तरंगसे ग्रस्त होकर कुतर्की बन जाते हैं। जो वेद-आगम और पुराणका ज्ञाता परमार्थको नहीं जानता है, उस कपटीका सब कथन कौवेका काँव-काँव ही है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसी चिन्तासे भलीभाँति बेचैन तथा परमार्थतत्त्वसे दूर प्राणी दिन-रात शास्त्रका अध्ययन करता है। वाक्य ही छन्द है और उस छन्दसे गुम्फित काव्योंमें अलंकार सुशोभित होता है। इस चिन्तासे दुःखित मूर्ख व्यक्ति अत्यधिक व्याकुल हो जाता है। उस परमतत्त्वका अन्य ही अर्थ है; किंतु लोग उसका दूसरा अर्थ लगाकर दुःखित होते हैं। शास्त्रोंका सद्भाव कुछ और ही है; किंतु वे उसकी व्याख्या उससे भिन्न ही करते हैं। उपदेशादिसे रहित कुछ अहंकारी व्यक्ति उन्मनीभावकी बात