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Read in contextप्रेतकल्प] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५१५
इस जन्मका लाभ लेकर जो मनुष्य आत्महितका ज्ञान नहीं रखता है, वह ब्रह्मघाती है। किसीका भी पुरुषार्थ शरीरके बिना सम्भव नहीं है। अतः शरीररूपी धनकी रक्षा करते हुए पुण्य कर्म करना चाहिये। आत्मा सभीका पात्र है, इसलिये उसकी रक्षामें मनुष्य सर्वदा संलग्न रहे। जो व्यक्ति आजीवन उस आत्माकी रक्षामें प्रयत्नशील रहता है, वह जीवित रहते हुए ही अपना कल्याण देखता है। मनुष्यको ग्राम, क्षेत्र, धन, घर, शुभाशुभ कर्म और शरीर बार-बार नहीं प्राप्त होता है। विद्वान् लोग सदैव शरीरकी रक्षाके उपायमें लगे रहते हैं। कुष्ठादि महाभयंकर रोगोंसे ग्रस्त होनेपर भी मनुष्य उस शरीरको छोड़ना नहीं चाहता है। शरीरकी रक्षा धर्मके लिये, धर्मकी रक्षा ज्ञानके लिये और ज्ञानकी रक्षा ध्यानयोगके लिये तथा ध्यानयोगकी रक्षा तत्काल मुक्तिप्राप्तिके लिये होती है। यदि आत्मा ही अहितकारी कार्योंसे अपनेको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है तो अन्य दूसरा कौन ऐसा हितकारी होगा जो आत्माको सुख प्रदान करेगा।
यहीं इसी लोकमें नरकरूपी व्याधिकी चिकित्सा नहीं की गयी तो औषधिविहीन देश (परलोक)-में जाकर रोगी उससे मुक्तिका क्या उपाय करेगा ? बुढ़ापा तो बाघिनके समान है। जिस प्रकारसे फूटे हुए घड़ेका जल धीरे-धीरे बह जाता है, उसी प्रकार आयु भी क्षीण होती रहती है। शरीरमें विद्यमान रोग शत्रुके सदृश कष्ट देते हैं, इसलिये कल्याण इसीमें है कि इन सभीसे मुक्ति प्राप्त करनेका सत्प्रयास किया जाय। जबतक शरीरमें किसी प्रकारका दुःख नहीं होता है, जबतक विपत्तियाँ सामने नहीं आती हैं और जबतक शरीरकी इन्द्रियाँ शिथिल नहीं पड़ती हैं, तबतक ही आत्मकल्याणका प्रयास हो सकता है। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये सम्यक् प्रयत्न किया जा सकता है। कोशागारमें आग लग जानेपर मूर्ख कुआँ खोदता है, ऐसे प्रयत्नसे क्या लाभ—
इहैव नरकव्याधेश्चिकित्सां न करोति यः।
गत्वा निरौषधं देशं व्याधिस्थः किं करिष्यति ॥
व्याघ्रीवास्ते जरा चायुर्याति भिन्नघटाम्बुवत्।
निघ्नन्ति रिपुवद्रोगास्तस्माच्छ्रेयः समभ्यसेत् ॥
यावन्नाश्रयते दुःखं यावन्नायान्ति चापदः।
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावच्छ्रेयः समभ्यसेत् ॥
यावत् तिष्ठति देहोऽयं तावत् तत्त्वं समभ्यसेत्।
संदीप्तकोशभवने कूपं खनति दुर्मतिः॥
(४९। २३—२६)
मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक कार्योंमें व्यस्त रहनेसे (बीतते हुए) समयको नहीं जान पाता है। वह दुःख-सुख तथा आत्महितको भी नहीं जानता है। पैदा होनेवालोंको, रोगियोंको, मरनेवालेको, आपत्तिग्रस्तको और दुःखी लोगोंको देखकर भी मनुष्य मोहरूपी मदिराको पीकर (जन्म-मरणादि दुःखसे युक्त संसारसे) नहीं डरता। सम्पदाएँ स्वप्नके समान हैं, यौवन पुष्पके सदृश है, आयु चञ्चल बिजलीके तुल्य नष्टप्राय है, ऐसा जानकर भी किसको धैर्य हो सकता है ? सौ वर्षका जीवन अत्यल्प है। वह भी निद्रा तथा आलस्यमें आधा चला जाता है। तदनन्तर बाल्यावस्था, रोग, वृद्धावस्था एवं अन्यान्य दुःखोंमें व्यतीत हो गया और जो थोड़ा बचा वह भी निष्फल हो जाता है—
कालो न ज्ञायते नानाकार्यैः संसारसम्भवैः।
सुखं दुःखं जनो हन्त न वेत्ति हितमात्मनः॥
जातानार्तीं मृतानापदभ्रष्टान् दृष्ट्वा च दुःखितान्।
लोको मोहसुरां पीत्वा न बिभेति कदाचन॥
सम्पदः स्वप्नसंकाशा यौवनं कुसुमोपमम्।
तडिच्चपलमायुष्यं कस्य स्याज्जानतो धृतिः॥
शतं जीवितमत्यल्पं निद्रालस्यैस्तदर्धकम्।
बाल्यरोगजरादुःखैरल्पं तदपि निष्फलम्॥
(४९। २७—३०)