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संक्षिप्त गरुडपुराण
[ धर्मकाण्ड-
किया। यमपाशमें आबद्ध वैश्य अपने किये हुए कर्मोंके विषयमें सोचता है कि मैंने किसी प्रकारका पुण्य-संचय नहीं किया, कुटुम्बके लिये मोहान्ध होकर क्रय-विक्रयमें मैंने सत्यका भी प्रयोग नहीं किया। ऐसे ही शूद्रका शरीर प्राप्त करनेवाला भी अपने कर्तव्यसे विमुख रहते हुए यदि शरीर त्याग करता है तो वह भी यह चिंता करता है कि मैंने ब्राह्मणोंको न तो यशस्कर दान दिया है और न उनकी पूजा की है। मेरे द्वारा इस पृथ्वीपर जलाशयका निर्माण नहीं करवाया गया है। मैंने किसी संस्कारहीन ब्राह्मणश्रेष्ठका संस्कार करानेमें योगदान भी नहीं किया है। शास्त्रविहित अपने कर्मोंका परित्याग करके मदान्ध होकर मैं जीवित रहा। श्रेष्ठ तीर्थमें जाकर अपने शरीरका परित्याग भी नहीं किया। मैंने धर्मार्जन भी नहीं किया है। कभी सद्गति प्राप्त करनेके लिये मैंने देवताओंकी पूजा भी नहीं की है।
समस्त लोकोंमें पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल—ये तीन लोक सारभूत हैं। सभी द्वीपोंमें जम्बूद्वीप, समस्त देशोंमें देवदेश अर्थात् भारतवर्ष और सभी जीवोंमें मनुष्य ही सार है। इस जगत्के सभी वर्णोंमें ब्राह्मणादि चार वर्ण तथा उन वर्णोंमें भी धर्मनिष्ठ व्यक्ति श्रेष्ठ हैं। इस लोकयात्राके मार्गमें स्थित जीवात्मा धर्मसे सभी प्रकारका सुख और ज्ञान प्राप्त करता है। हे पक्षिन्! गर्भस्थ जीवको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान रहता है, वह वहाँ स्मरण करता है कि आयुके समाप्त होनेपर शरीरका परित्याग करके अब मैं मलादिमें रहनेवाले छोटे-छोटे कृमि या कीटाणुओंकी एक विशेष योनिमें स्थित हूँ, मैं सरककर चलनेवाले सर्पादिकी योनिमें पहुँचा, मच्छर हो गया था, चार पैरोंवाला अश्व या वृषभ नामक पशु बन गया था अथवा जंगली सूकरकी योनिमें प्रविष्ट था। इस प्रकार गर्भमें रहते हुए उस जीवात्माको पूर्ण ज्ञान रहता है, किंतु उत्पन्न होते ही वह तत्काल उसे भूल जाता है। गर्भमें पहुँचकर जो जीवात्मा चिन्तन करता है, शरीरधारी वैसा ही जन्म लेकर बालक, युवा और वृद्ध होता है। यदि गर्भमें सोची गयी बात सांसारिक व्यामोहके कारण विस्मृत हो जाती है तो पुनः मृत्युकालमें उसकी याद आ जाती है। यदि शरीरके नष्ट होनेपर वह हृदयमें ही रह गयी है तो पुनः गर्भमें जानेपर उसका स्मरण होना निश्चित है। उसे याद आता है कि मैं दूसरेको छलनेका विचार करता रहा। मैंने शरीरकी रक्षाके लिये धर्मका परित्याग करके द्यूत, छल-कपट और चोरवृत्तिका आश्रय लिया।
अत्यन्त कष्टसे मैंने स्वयं लक्ष्मीको एकत्र किया था, किंतु अभिलषित धनका उपभोग मैं नहीं कर सका। अग्निदेव, अतिथि और बन्धु-बान्धवोंको स्वादिष्ट अन्न, फल, गोरस तथा ताम्बूल दे करके मैं उन्हें संतुष्ट करनेमें असफल रहा। चन्द्रग्रहण हो या मेष-मकर राशियोंपर सूर्यके प्रवेशका पुण्यकाल हो, ऐसे अवसरपर भी श्रेष्ठ तीर्थोंका सेवन मैंने नहीं किया। इसलिये हे देहिन्! तुम मल-मूत्रसे भरे हुए अपने इस कोशको परिपुष्ट करनेमें लगे रहे। अतः तुम्हारा उद्धार कहाँ हो सकता है? इस पृथ्वीपर स्थित त्रिविक्रम भगवान् विष्णुकी प्रतिमाका दर्शन मैंने नहीं किया, उन्हें प्रणाम नहीं किया और न तो उनकी पूजा की है। प्रभासक्षेत्रमें विराजमान भगवान् सोमनाथकी भक्तिपूर्वक पूजा एवं वन्दना भी मेरे द्वारा नहीं हुई है। जब ऐसी चिंता मृत प्राणी करता है, तब यमदूत उससे कहते हैं कि हे देहधारिन्! जैसा तुमने किया है, उसके अनुसार अपना निस्तार करो। हे देहिन्! पृथ्वीके श्रेष्ठतम तीर्थोंकी संनिधिमें जाकर उनमें स्नानकर तुम्हारे द्वारा विद्वानों, ब्राह्मणों एवं गुरुजनोंके हाथमें कुछ नहीं दिया गया, अतः जैसा तुमने किया है, वैसा भोगो। हे जीव! तुमने चन्दन और नैवेद्यादि पञ्चोपचारसे और चन्दनादियुक्त बलि प्रदान करके मातृकापूजा नहीं की, न तो तुम्हारे द्वारा विष्णु,