Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 600 of 634

Read in context
Page 600

५९० संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

जितना दान दिया जाता है, उतना ही उसका पुण्य है। अतः मनुष्यको अपने हाथसे ही दान देना चाहिये। मृत्यु होनेके बाद कौन किसके लिये दान देगा ? दान-धर्मसे रहित कृपणतापूर्वक जीवन जीनेसे क्या लाभ ? इस नश्वर शरीरसे स्थिर कर्म करना चाहिये। प्राण अतिथिकी तरह अवश्य छोड़कर चले जायेंगे।

हे पक्षिराज ! इस प्रकार प्राणिवर्गके समस्त दुःखका वर्णन मैंने तुमसे कर दिया है। इसके साथ यह भी बता दिया है कि प्रेतके मोक्ष एवं लोकमङ्गलके लिये उसके और्ध्वदैहिक कर्मको करना चाहिये।

सूतजीने कहा—हे विप्रगण ! परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके द्वारा दिये गये ऐसे प्रेत-चरितसे सम्बन्धित उपदेशको सुनकर गरुडको अत्यन्त संतुष्टि प्राप्त हुई।

हे ऋषियो ! जीव-जन्तुओंके जन्मादिका यही सब विधान है। यही जन्म, मरण, प्रेतत्व तथा और्ध्वदैहिक कृत्यका नियम है। मैंने सब प्रकारसे उनके मोक्ष आदि कारणका वर्णन कर दिया है।

'जिनके हृदयमें नीलकमलके समान श्यामवर्णवाले भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, उन्हींको लाभ और विजय प्राप्त होती है। ऐसे प्राणियोंकी पराजय कैसे हो सकती है? धर्मकी जीत होती है, अधर्मकी नहीं। सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। क्षमाकी विजय होती है, क्रोधकी नहीं। विष्णु ही जीतते हैं, असुर नहीं। विष्णु ही माता हैं, विष्णु ही पिता हैं और विष्णु ही अपने स्वजन बान्धव हैं; जिनकी बुद्धि इस प्रकार स्थिर हो जाती है, उनकी दुर्गति नहीं होती है। भगवान् विष्णु मङ्गलस्वरूप हैं, गरुडध्वज मङ्गल हैं, भगवान् पुण्डरीकाक्ष मङ्गल हैं एवं हरि मङ्गलके ही आयतन हैं। हरि ही गङ्गा और ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण तथा गङ्गा उन विष्णुके मूर्तरूप हैं। अतः गङ्गा, हरि एवं ब्राह्मण ही इस त्रिलोकके सार हैं'—

मया प्रोक्तं वै ते मुक्त्यै निदानं चैव सर्वशः।
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुराः॥
विष्णुर्माता पिता विष्णुर्विष्णुः स्वजनबान्धवाः।
येषामेव स्थिरा बुद्धिर्न तेषां दुर्गतिर्भवेत्॥
मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं गरुडध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनं हरिः॥
हरिर्भागीरथी विप्रा विप्रा भागीरथी हरिः।
भागीरथी हरिर्विप्राः सारमेतज्जगत्त्रये॥
(४७। ४५-४९)

इस प्रकार सूतजी महाराजके मुखसे निकली हुई, सभी शास्त्रोंके मूल तत्त्वोंसे सुशोभित भगवान् विष्णुकी वाणी-रूपी अमृतका पान करके समस्त ऋषियोंको बहुत संतुष्टि प्राप्त हुई। वे सभी परस्पर उन सर्वार्थद्रष्टा सूतजीकी प्रशंसा करने लगे। शौनक आदि मुनि भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। 'प्राणी चाहे अपवित्र हो या पवित्र हो, सभी अवस्थाओंमें रहते हुए भी जो पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर और भीतरसे पवित्र हो जाता है'—

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
(४७।५२)
(अध्याय ४७)