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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 60 of 634

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Page 60
५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मन्त्रसे माता दुर्गा और गुरुकी पादुकाओंको नमस्कार करके देवी त्रिपुराके आसन और मूर्तिको प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् वह (साधक) 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि'—इस मन्त्रसे हृदयादिन्यास करे और फिर इसी मन्त्रसे 'रुद्रचण्डा, प्रचण्डदुर्गा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका तथा दुर्गा'—इन नौ शक्तियोंका पूजन करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग आदि मुद्राओंका प्रदर्शनकर उसके अग्निकोणमें सदाशिव आदि देवोंकी पूजा करे। अतः साधक पहले 'ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः' कहकर प्रणाम करे। तत्पश्चात् 'ॐ ऐं क्लीं (ह्रीं) सौं त्रिपुरायै नमः' यह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुराशक्तिको नमस्कार करे।

साधक उसके बाद भगवती त्रिपुराके पद्मासन, मूर्ति और हृदयादि अङ्गोंको प्रणाम करे। तत्पश्चात् उस पद्मपीठपर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका—इन आठ देवियोंकी पूजा करे। इन देवियोंकी पूजाके बाद 'भैरव' नामक देवोंकी पूजाका विधान है। असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण तथा संहार नामवाले—ये आठ भैरव हैं।

भैरव-पूजाके पश्चात् रति, प्रीति, कामदेव, पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्नराज, गुरु और क्षेत्रपाल-देवोंका भी पूजन करे।

साधकको पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपीठ बनाकर उसपर और हृदयमें शुक्ल वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक एवं अभयमुद्रासे सुशोभित भगवती सरस्वतीका भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्रका जप और हवन करनेसे भगवती त्रिपुरेश्वरी साधकके लिये सिद्धिदात्री हो जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी पूजाका भी विधान है। विशेष पूजनमें मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिये।

(अध्याय २४—२६)


सर्पों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र

सूतजीने कहा—अब मैं सर्पादि विभिन्न विषैले जीव-जन्तुओंके काटनेसे कष्ट पहुँचानेवाले विषको दूर करनेमें समर्थ मन्त्रको कह रहा हूँ, जो इस प्रकार है—

'ॐ कणिचिकीणिक्ववाणी चर्वाणी भूतहारिणि फणिविषिणि विरथनारायणि उमे दह दह हस्ते चण्डे रौद्रे माहेश्वरि महामुखि ज्वालामुखि शङ्कुकर्णि शुकमुण्डे शत्रुं हन हन सर्वनाशिनि स्वेदय सर्वाङ्गशोणितं तन्निरीक्षसि मनसा देवि सम्मोहय सम्मोहय रुद्रस्य हृदये जाता रुद्रस्य हृदये स्थिता। रुद्रो रौद्रेण रूपेण त्वं देवि रक्ष रक्ष मां हूं मां हूं फफफ ठठ स्कन्दमेखलाबालग्रह-शत्रुविषहारी ॐ शाले माले हर हर विष्ठोङ्काररहिविषवेगे हां हां शवरि हुं शवरि आकौलवेगेशे सर्वे विंचमेघमाले सर्वनागादि-विषहरणम्।'

इस मन्त्रका प्रयोग करते समय माहेश्वरी उमादेवीसे प्रार्थना करे कि हे उमे! तुम रुद्रके हृदयमें उत्पन्न हुई हो और उसीमें रहती हो। तुम्हारा रौद्र रूप है। तुम्हें रौद्री भी कहा जाता है। तुम्हारा मुख ज्वालाके समान जाज्वल्यमान है तथा तुमने अपने कटिप्रदेशमें क्षुद्र घण्टिका लगी करधनी पहन रखी है। तुम भूतोंकी प्रिय हो, सर्पोंके लिये विषरूपिणी हो, तुम्हारा नाम विरथनारायणी है तथा तुम शुकमुण्डा हो और कानोंमें शङ्कु पहनी हुई हो। हे विशाल मुखवाली, भयंकर एवं प्रचण्ड स्वभाववाली चण्डादेवी! हाथोंमें ज्वलन-शक्ति पैदा कर, शत्रु्का हनन कर, हनन कर। सब