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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 598 of 634

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Page 598
५८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

अपने धर्मपर चलनेसे ही होती है। हे वैनतेय! देव और मानवयोनिमें जो दान तथा भोगादिकी क्रियाएँ दिखायी देती हैं, वे सब कर्मजन्य फल हैं। घोर अकर्मसे और काम-क्रोधके द्वारा अर्जित जो अशुभ पापाचार हैं, उनसे नरक प्राप्त होता है तथा वहाँसे जीवका उद्धार नहीं होता है। (अध्याय ४६)


यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पापकर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा

गरुडने कहा—हे देवदेवेश! महाप्रभो! अब आप परम कृपा करके दान, दानके माहात्म्य और वैतरणीके प्रमाणका वर्णन करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे तार्क्ष्य ! यमलोकके मार्गमें जो वैतरणी नामकी महानदी है, वह अगाध, दुस्तर और देखनेमात्रसे पापियोंको महाभयभीत करनेवाली है। वह पीब और रक्तरूपी जलसे परिपूर्ण है। मांसके कीचड़से परिव्याप्त एवं तटपर आये हुए पापियोंको देखकर उन्हें नाना प्रकारसे भयाक्रान्त करनेवाले स्वरूपको धारण कर लेती है। पात्रके मध्यमें घीकी भाँति वैतरणीका जल तुरंत खौलने लगता है। उसका जल कीटाणुओं एवं वज्रके समान सूँडवाले जीवोंसे व्याप्त है। सूँस, घड़ियाल, वज्रदन्त तथा अन्यान्य हिंसक एवं मांसभक्षक जलचरोंसे वह महानदी भरी हुई है। प्रलयके अन्तमें जैसे बारहों सूर्य उदित होकर विनाशलीला करते हैं, वैसे ही वे वहाँपर भी सदैव तपते रहते हैं, जिससे उस महातापमें वे पापी चिल्लाते हुए करुण विलाप करते हैं। उनके मुखसे बार-बार हा भ्रात, हा तात यही शब्द निकलता है। वे जीव उस महाभयंकर धूपमें इधर-उधर भागते हैं, उस दुर्गन्धपूर्ण जलमें डुबकी लगाते हैं और अपनी आत्मग्लानिसे व्यथित होते हैं। वह महानदी चारों प्रकारके प्राणियोंसे भरी हुई दिखायी देती है। पृथ्वीपर जिन लोगोंने गोदान किया है, उस दानके प्रभावसे वे उसे पार कर जाते हैं अन्यथा जिनके द्वारा यह दान नहीं हुआ है, वे उसीमें डूबते रहते हैं।

जो मूढ़ मेरी, आचार्य, गुरु, माता-पिता एवं अन्य वृद्धजनोंकी अवमानना करते हैं, मरनेके बाद उनका वास उसी महानदीमें होता है। जो मूढ़ अपनी विवाहिता पतिव्रता, सुशीला और धर्मपरायणा पत्नीका परित्याग करते हैं, उनका सदैवके लिये उसी महाघिनौनी नदीके जलमें वास होता है। विश्वासमें आये हुए स्वामी, मित्र, तपस्वी, स्त्री, बालक एवं वृद्धका वध करके जो पापी उस महानदीमें गिरते हैं, वे उसके बीचमें जाकर करुण विलाप करते हुए अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। शान्त तथा भूखे ब्राह्मणको विघ्न पहुँचानेके लिये जो उसके पास जाता है, वहाँ प्रलयपर्यन्त कृमि उसका भक्षण करते हैं। जो ब्राह्मणको प्रतिज्ञा करके प्रतिज्ञात वस्तु नहीं देता है अथवा बुलाकर जो 'नहीं है'—ऐसा कहता है, उसका वहाँ वैतरणीमें वास होता है। आग लगानेवाला, विष देनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, मद्य पीनेवाला, यज्ञका विध्वंस करनेवाला, राजपत्नीके साथ गमन करनेवाला, चुगलखोरी करनेवाला, कथामें विघ्न करनेवाला, स्वयं दी हुई वस्तुका अपहरण करनेवाला, खेत (मेड़) और सेतुको तोड़नेवाला, दूसरेकी पत्नीको प्रधर्षित करनेवाला, रस-विक्रेता तथा वृषलीपति ब्राह्मण, प्यासी गायोंकी बावलीको तोड़नेवाला, कन्याके साथ व्यभिचार करनेवाला, दान देकर पश्चात्ताप करनेवाला, कपिलाका दूध पीनेवाला