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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 593 of 634

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Page 593

प्रेतकल्प ]
दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म
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उन्हें पापकर्म करनेवाला कहा गया है।* जो पाखण्डी, वर्णाश्रमधर्मसे रहित, महापातकी तथा व्यभिचारिणी स्त्रियाँ और आरूढपतित (संन्यासाश्रममें जाकर पतित होनेवाले) हैं, उनका दाहसंस्कार, नव श्राद्ध एवं सपिण्डन नहीं करना चाहिये। श्राद्ध सोलह बताये गये हैं, उनको भी ऐसे पापियोंके लिये न करे। यदि अग्निहोत्र करनेवाला ब्राह्मण ऐसा पापकर्म करता है तो घरवाले मरनेपर उसकी जो जीविकावृत्ति है, उसको जलमें फेंक दें और उसके घरकी अग्निको चौराहेपर ले जाकर डाल दें तथा उसके पात्रोंको अग्निमें जला दें।

हे काश्यप! पूर्वोक्त पापियोंकी मृत्युका एक वर्ष पूर्ण हो जाय तो दयावान् परिजनोंको शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको गन्ध-अक्षत-पुष्पादिसे विष्णु और यमकी पूजा करके कुशोंके ऊपर मधुयुक्त और घृतमिश्रित दस पिण्ड देना चाहिये।

मौन होकर तिलके सहित विष्णु और यमका ध्यान करते हुए दक्षिणाभिमुख होकर पूर्वोक्त दस पिण्ड प्रदान करे। उन पिण्डोंको उठाकर और एकमें मिलाकर तीर्थके जलमें डालते हुए मृतकके नाम और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये।

इसके बाद पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे विष्णु और यमकी पुनः पूजा करे। उस दिन उपवास रहकर कुल, विद्या, तप और शीलसे सम्पन्न यथासामर्थ्य नौ अथवा पाँच साधु ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उसके दूसरे दिन मध्याह्न कालमें पूर्वदिनके समान पुनः विष्णु एवं यमकी पूजा करके उत्तराभिमुख उन ब्राह्मणोंको आसनपर बैठाये। उसके बाद यज्ञोपवीती कर्ता आवाहन, अर्घ्य तथा दानादिमें विष्णु और यमसे समन्वित प्रेतके नामका कीर्तन करे तथा प्रेत, यम और विष्णुका स्मरण करते हुए श्राद्ध सम्पन्न करे। उस अवसरपर पिण्डदानके लिये अन्य देवोंका भी आवाहन करना चाहिये। उसके बाद उन्हें क्रमशः दस अथवा पाँच पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। यथा— पहला पिण्ड विष्णुदेव, दूसरा पिण्ड ब्रह्मा, तीसरा पिण्ड शिव, चौथा पिण्ड भृत्यसहित शिव और पाँचवाँ पिण्ड प्रेतके लिये देय है। प्रेतके नाम एवं गोत्रका स्मरण तथा विष्णु शब्दका उच्चारण करना चाहिये। पिण्डदान होनेके बाद सिर झुकाकर नमस्कार करते हुए पाँचवें पिण्डको कुशोंपर स्थापित करे। तदनन्तर यथाशक्ति गौ-भूमि और पिण्डदानादिके द्वारा उस प्रेतका स्मरण करते हुए कुश तथा तिलसे युक्त उन ब्राह्मणोंके कुशयुक्त हाथोंमें तिल-दान दे।

इसके बाद ब्राह्मणोंको अन्न, ताम्बूल और दक्षिणा देकर श्रेष्ठतम ब्राह्मणकी स्वर्णदानसे पूजा करे। यह दान नाम-गोत्रका स्मरण करते हुए 'विष्णु प्रसन्न हों', ऐसा कहकर देना चाहिये।

तदनन्तर ब्राह्मणोंका अनुगमन करके यजमान दक्षिणाभिमुख होकर प्रेतके नाम-गोत्रका कीर्तन करते हुए 'प्रीतोऽस्तु' ऐसा कहकर भूमिपर जल गिरा दे। तत्पश्चात् मित्र एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ श्राद्धके अवशिष्ट भोजनको संयत वाक् होकर ग्रहण करे।

तदनन्तर प्रतिवर्ष सांवत्सर श्राद्ध एकोद्दिष्ट विधानसे करना चाहिये। इस प्रकारकी क्रिया करनेसे पापीजन स्वर्ग चले जायँगे। इसके बाद वे सपिण्डीकरण आदिकी क्रियाओंको करनेपर उसे प्राप्त करते हैं।

यदि प्रमादवश किसी मनुष्यकी जल आदिमें डूबकर अपमृत्यु हो जाती है तो उसके पुत्र या सगे-सम्बन्धीको यथाविधि सभी और्ध्वदैहिक कर्म करने आवश्यक हैं। प्रमादवश अथवा इच्छापूर्वक भी प्राणीको सर्पके सामने कदापि नहीं जाना चाहिये। (ऐसी स्थितिमें सर्प-दंशसे मृत्यु होनेपर) प्रतिमास दोनों पक्षोंकी पञ्चमी तिथिको नागदेवताकी पूजा करे। भूमिपर शालिचूर्णसे नागदेवकी आकृति बनावे। श्वेत पुष्प, सुगंध, धूप,


* स्वेच्छया तार्क्ष्य मरणं शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः। चाण्डालाद्यात्मघातैश्च विषाद्यैस्ताडनैस्तथा ॥
जलाग्निपातवातैश्च निराहारादिभिस्तथा। येषामेव भवेन्मृत्युः प्रोक्तास्ते पापकर्मिणः॥ (४४। १-२)