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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 584 of 634

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Page 584
५७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

तीर्थमरणकी महिमा, अन्त समयमें भगवन्नामकी महिमा, शालग्रामशिला तथा तुलसीकी सन्निधिमें मरणका फल, मुक्तिदायक तथा स्वर्गदायक प्रशस्त कर्म, इष्टापूर्तकर्म तथा अनाथ प्रेतके संस्कारका माहात्म्य

ताक्ष्यने कहा— हे प्रभो! दान एवं तीर्थ करनेवालेको स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। अब आप इसका ज्ञान मुझे करायें। हे स्वामिन्! किस दान और तीर्थ-सेवनसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है? किस दान एवं तीर्थके पुण्यसे प्राणी चिरकालतक स्वर्गमें रह सकता है? क्या करनेसे वह स्वर्गलोक एवं सत्यलोकसे तेजोलोकमें जाता है। किस पापसे मनुष्य नाना प्रकारके नरकोंमें डूबता रहता है। हे भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् जनार्दन! आप मुझको यह भी बतानेकी कृपा करें कि कहाँपर मृत्यु होनेसे प्राणीको स्वर्ग और मोक्ष भी प्राप्त होता है, जिससे कि पुनर्जन्म नहीं होता।

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! भारतवर्षमें मानवयोनि तेरह जातियोंमें विभक्त है। यदि उसको प्राप्त करके मनुष्य अपने अन्तिम जीवनका उत्सर्ग तीर्थमें करता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका और द्वारका—ये सात पुरियाँ मोक्ष देनेवाली हैं।* प्राणोंके कण्ठगत हो जानेपर 'मैं संन्यासी हो गया'—ऐसा जो कह दे तो मरनेपर विष्णुलोक प्राप्त करता है। पुनः पृथ्वीपर उसका जन्म नहीं होता।

जो मनुष्य मृत्युके समय एक बार 'हरि' इस दो अक्षरका उच्चारण कर लेता है, वह मानो मोक्ष प्राप्त करनेके लिये कटिबद्ध हो गया है। जो मनुष्य प्रतिदिन 'कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण'—यह कहकर मेरा स्मरण करता है, उसको मैं नरकसे उसी प्रकार निकाल देता हूँ जिस प्रकार जलका भेदन कर कमल ऊपर निकल जाता है। जहाँपर शालग्राम शिला है या जहाँपर द्वारवती शिला है किंवा जहाँपर इन दोनों शिलाखण्डोंका संगम है, वहाँ प्राणीको मुक्ति निस्सन्देह ही प्राप्त होती है। समस्त पाप एवं दोषोंका विनाश करनेवाली शालग्राम शिला जहाँ विद्यमान है, वहाँ उसके सांनिध्यमें मृत्यु होनेसे जीवको निस्सन्देह मोक्ष मिलता है—

मृतो विष्णुपुरं याति न पुनर्जायते क्षितौ।
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्॥
बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति।
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः॥
जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्।
शालग्रामशिला यत्र यत्र द्वारवती शिला॥
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः।
शालग्रामशिला यत्र पापदोषक्षयावहा॥
तत्सन्निधानमरणान्मुक्तिर्जन्तोः सुनिश्चिता।
(३८।७—११)

हे खग! तुलसीका वृक्ष लगाने, पालन करने, सींचने, ध्यान-स्पर्श और गुणगान करनेसे मनुष्योंके पूर्व जन्मार्जित पाप जलकर विनष्ट हो जाते हैं—


* अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका॥ पुरी द्वारवती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिकाः। (३८।५-६)