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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 579 of 634

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Page 579

प्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण-श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान ५६१

यथाक्रम दस पुरुष होते हैं, उन सभीको मिलाकर पितरोंकी संख्या इक्कीस होती है।

इस संसारमें विधिपूर्वक जो मनुष्य उक्त श्रेष्ठतम श्राद्ध करता है, उसमें कर्ताकी ओरसे कोई संदेहकी स्थिति नहीं रह जाती है तो उसका जो फल होता है, उसे भी तुम सुनो।

हे खगेश! पिता प्रसन्न होकर पुत्रोंको संतान प्रदान करता है, जिससे उनकी वंश-परम्परा अविच्छिन्न होती है। श्राद्धकर्ताका प्रपितामह प्रसन्न हो करके स्वर्णदाता हो जाता है। वृद्धप्रपितामह प्रसन्न होकर श्राद्धकर्ताको विपुल अन्नादि प्रदान करते हैं। श्राद्धके जो ये फल हैं, ये ही पितरोंके तर्पणसे भी प्राप्त होते हैं। हे पक्षिन्! इस मर्त्यलोकमें जिस पुरुषकी संतान-परम्परा नष्ट हो जाती है, वह मृत्युके बाद उसी प्रकार नरकलोकमें वास करता है, जिस प्रकार कीचड़में फँसा हुआ हाथी होता है। (नरक-भोग प्राप्त करनेके बाद) वह प्राणी वृक्ष अथवा सरीसृप-योनिमें जन्म लेता है। वह उस नरकसे बिना संतानके निश्चित ही मुक्त नहीं होता है। अतः संतानविहीन मरे हुए प्राणीके लिये आचार्य, शिष्य अथवा दूरके सगोत्री (अबान्धव)-को उसके उद्देश्यसे भक्तिपूर्वक 'नारायणबलि' कर देनी चाहिये। उस कृत्यसे पापविमुक्त होकर वह विशुद्धात्मा निश्चित ही नरकसे छुटकारा पा जाता है और स्वर्गमें जाकर वास करता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

धनिष्ठासे लेकर रेवतीपर्यन्त जो पाँच नक्षत्र हैं, ये सभी सदैव अशुभ होते हैं। उन नक्षत्रोंमें ब्राह्मण आदि समस्त जातियोंका दाह-संस्कार या बलिकर्म नहीं करना चाहिये। इन नक्षत्रोंमें मृत प्राणीके लिये जल भी प्रदान करना उचित नहीं है, ऐसा करनेसे वह अशुभ हो जाता है। दुःखार्त (मृत) स्वजन हों तो भी इस कालमें लोक (शव)-यात्रा नहीं करनी चाहिये। स्वजनको पञ्चककी शान्तिके बाद ही मृतका सब संस्कार करना चाहिये, अन्यथा पुत्र और सगोत्रियोंको उस अशुभ पञ्चकके कुप्रभावसे दुःख ही झेलना पड़ता है। जो मनुष्य इन नक्षत्रोंमें मृत्यु प्राप्त करता है, उसके घरमें हानि होती है।

इस पञ्चककी अवधिमें जो प्राणी मर जाता है, उसका दाह-संस्कार तत्सम्बन्धित नक्षत्रके मन्त्रसे आहुति प्रदान करके नक्षत्रके मध्यकालमें भी किया जा सकता है। सद्यः की गयी आहुति पुण्यदायिनी होती है; तीर्थमें किया गया दाह उत्तम होता है। ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक यह कार्य मन्त्रसहित विधिपूर्वक करना चाहिये। वे यथाविधि अभिमन्त्रित कुशकी चार पुत्तलिकाओंको बना करके शवके समीपमें रख दें। उसके बाद उन पुत्तलिकाओंके सहित उस शवका दाह-संस्कार करें। तदनन्तर सूतकके समाप्त होनेपर पुत्रको शान्तिकर्म भी करना चाहिये।

जो मनुष्य इन धनिष्ठादि पाँच नक्षत्रोंमें मरता है, उसको उत्तम गति नहीं प्राप्त होती है। अतएव उसके उद्देश्यसे तिल, गौ, सुवर्ण और घृतका दान विप्रोंको देना चाहिये। ऐसा करनेसे सभी प्रकारके उपद्रवोंका विनाश हो जाता है। अशौचके समाप्त होनेपर मृत प्राणी अपने सत्पुत्रोंसे सद्गति प्राप्त करता है। जो पात्र, पादुका, छत्र, स्वर्ण-मुद्रा, वस्त्र तथा दक्षिणा ब्राह्मणको दी जाती है, वह सभी पापोंको दूर करनेवाली है। पञ्चकमें मरे हुए बाल, युवा और वृद्ध प्राणियोंका और्ध्वदेहिक संस्कार प्रायश्चित्तपूर्वक जो मनुष्य नहीं करता है, उसके लिये नाना प्रकारका विघ्न जन्म लेता है।

प्रेतश्राद्धमें अठारह वस्तुएँ त्याज्य होती हैं। यथा—आशीर्वाद, द्विगुण कुश (मोटक), प्रणवका उच्चारण, एकसे अधिक पिण्डदान, अग्नौकरण, उच्छिष्ट श्राद्ध, वैश्वदेवार्चन, विकिरदान, स्वधाका