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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 574 of 634

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Page 574
५६४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

एकादशाहको जो श्राद्ध किया जाता है, उसका नाम नवक है। इस दिन चौराहेपर प्रेतके निमित्त भोजन रख करके श्राद्धकर्ता पुनः स्नान करे। एकादशाहसे वर्षपर्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन सान्नोदक घटका दान करना चाहिये। मानव-शरीरमें जो अस्थियोंका एक समूह विद्यमान है, जिसमें उनकी कुल संख्या तीन सौ साठ है। जलपूर्ण घटका दान देनेसे उन अस्थियोंको पुष्टि मिलती है। इसलिये जो घट-दान दिया जाता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। जंगल या किसी विषम परिस्थितिमें जीवकी मृत्यु जिस दिन होती है, उस दिनसे घरमें सूतक होता है और उसीके अनुसार दशाहादि क्रियाएँ करनी चाहिये, दाह-संस्कार जब कभी भी हो।

तिलपात्र, अन्नादिक भोज्यपदार्थ, गन्ध, धूपादि एवं पूजन-सामग्रीका जो दान है, उसको एकादशाहमें देना चाहिये। उससे ब्राह्मणकी शुद्धि होती है। मृत्यु और जन्ममें घरमें होनेवाले सूतकसे क्रमशः— क्षत्रिय बारहवें दिन, वैश्य पंद्रहवें दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। मृत्युके तीन मास होनेपर त्रिरात्र, छः मास होनेपर पक्षिणी, संवत्सर पूर्ण होनेसे पूर्व अहोरात्र तथा संवत्सर पूर्ण होनेपर जलदानकी क्रिया करनेसे शुद्धि होती है। इसीके अनुसार सभी वर्णोंकी शुद्धि होती है। कलियुगमें सूतककी समाप्ति दशाहमें ही है। एकादशाहसे* लेकर सांवत्सरिक आदि सभी श्राद्धोंके अवसरपर विश्वेदेवोंकी पूजा करके अन्य पिण्डदान करना चाहिये। जैसे सूर्यकी किरणें अपने तेजसे सभी तारागणोंको ढक देती हैं, उसी प्रकार प्रेतत्वपर इन क्रियाओंका आच्छादन होनेसे भविष्यमें पुनः प्रेतत्व नहीं मिलता है। अतः सपिण्डनके अनन्तर कहीं 'प्रेत' शब्द प्रयोग नहीं होता।

श्रेष्ठ ब्राह्मण सर्वदा शय्यादानकी प्रशंसा करते हैं। यह जीवन अनित्य है, उसे मृत्युके बाद कौन प्रदान करेगा? जबतक यह जीवन है, तबतक अपने बन्धु-बान्धव हैं और अपने पिता हैं। मृत्यु हो जानेपर यह मर गया है, ऐसा जान करके क्षणभरमें ही वे अपने हृदयसे स्नेहको दूर कर देते हैं। इसलिये आत्मा ही अपना बन्धु है, ऐसा बारम्बार विचार करके जीते हुए ही अपने हितके कार्य कर लेना चाहिये। इस संसारमें मरे हुए प्राणीका कौन पुत्र है, जो बिस्तरके सहित शय्याका दान ब्राह्मणको दे सकता है? ऐसा सब कुछ जानते हुए मनुष्यको अपने जीवनकालमें ही अपने हाथोंसे शय्यादानादि सभी दान कर देना चाहिये। अतः अच्छी एवं मजबूत लकड़ीकी सुन्दर शय्या बनवा करके उसे हाथीके दाँत तथा सोनेकी पट्टियोंसे अलंकृत करके उस शय्याके ऊपर लक्ष्मीके सहित विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाको स्थापित करे। उसके बाद उसी शय्याके संनिकट घीसे परिपूर्ण कलश रखे। हे गरुड ! वह कलश अपने सुखके लिये ही होता है। विद्वानोंने तो उसको निद्राकलश कहा है। ताम्बूल, केशर, कुंकुम, कपूर, अगुरु, चन्दन, दीपक, पादुका, छत्र, चामर, आसन, पात्र तथा यथाशक्ति ससधान्य उसी शय्याके बगलमें स्थापित करे। इन वस्तुओंके अतिरिक्त शयन करनेवालेके लिये जो अन्य उपयोगी वस्तु हो, उसको भी वहाँ रखे। सोने-चाँदी या अन्य धातुसे बनी झारी, करक (करवा), दर्पण और पञ्चरंगी चाँदनीसे उस शय्याको संयुक्त करके उसे ब्राह्मणको दान दे दे।

कल्याणके लिये यजमान स्वर्गमें सुख प्रदान करनेवाली शय्याकी विधिवत् रचना करके सपत्नीक द्विज-दम्पतिकी पूजा करके उसका दान करे। कर्णफूल, कण्ठहार, अंगूठी, भुजबंद तथा चित्रकादि


* एकादशाह-श्राद्धके अनन्तर वर्षपर्यन्त किया जानेवाला एकोद्दिष्ट-श्राद्ध तथा प्रति सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट-श्राद्ध विश्वेदेवपूजनपूर्वक करनेकी परम्परा नहीं है।