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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 56
४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सूतजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं शिवकी अर्चनाका वर्णन करूँगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करनेवाली है। बारह अंगुलके मापमें बिन्दुद्वारा (किसी पात्रमें) भगवान् शिवकी मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, सर्वगत और निराकारका चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुद्वारा बनायी गयी मूर्तिमें ऊपरकी ओर पाँच बिन्दु लगाने चाहिये, जो शिवका मुख है। वह छोटे आकारमें होना चाहिये और नीचेकी ओर मूर्तिके अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े-बड़े अङ्ग बनाने चाहिये। मूर्तिके अधोभागमें छठा बिन्दु विसर्गके साथ होना चाहिये, जो अस्त्र है। इसके साथ 'हौं' लिख देना चाहिये—यह महामन्त्र है और सम्पूर्ण अर्थोंको देनेवाला है। साधक मूर्तिके ऊर्ध्वभागसे लेकर मूर्तिके चरणपर्यन्त अपने दोनों हाथोंसे स्पर्श करे और महामुद्रा दिखाये; इसके बाद सम्पूर्ण अङ्गोंमें न्यास-करन्यास आदि करे।

तदनन्तर वह अस्त्रमन्त्र 'ॐ फट्' का उच्चारण करता हुआ दाहिनी हथेलीसे स्पर्श करके शोधन करे। उसके बाद कनिष्ठा अँगुलीसे लेकर महामन्त्रसे ही तर्जनी अँगुलीतक न्यास करना चाहिये।

अब मैं हृदय-कमलकी कर्णिकामें* पूजनकी विधि बतलाऊँगा। उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादिकी अर्चना करे। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान अर्पित करे तथा अन्य विविध मानस उपचारोंको करके तदाकार हो जाय। उसके बाद अग्निमें आहुति देनेकी विधि कह रहा हूँ। साधकको पूजा-स्थलपर अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये 'ॐ फट्' अस्त्रमन्त्रसे एक कुण्डका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् 'ॐ हूं' इस कवचमन्त्रसे उस कुण्डका अभ्युक्षण करके मानिसकरूपसे उसमें शक्तिका विन्यास करे। उसके बाद साधकको हृदय अथवा शक्तिकुण्डमें क्रमशः ज्ञानरूपी तेज तथा अग्निका विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्निके निष्कृति-संस्कारको छोड़कर गर्भाधानादि समस्त संस्कार करनेका विधान है। निष्कृति या मोक्ष-संस्कार आहुतिके पश्चात् किया जाता है। [इसलिये आहुतिके पूर्व उस संस्कारका निषेध है।] समस्त संस्कारोंके बाद साधकको उस प्रज्वलित अग्निमें समस्त आङ्गिकदेवोंके साथ मानसिकरूपसे शिवको आहुति देनी चाहिये।

तदनन्तर कमलाङ्कित गर्भवाले उस मण्डलमें नीलकण्ठ शिवका पूजन करना चाहिये। इस मण्डलके अग्निकोणमें अर्धचन्द्राकार कल्याणकारी एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये।

तदनन्तर अग्निदेवताके अस्त्रोंसे युक्त हृदयादिमें न्यास करनेका विधान है। उसके बाद मण्डलके अन्तर्गत बने हुए कमलकी कर्णिकापर सदाशिवकी तथा दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करे।

अब श्रेष्ठ पञ्चतत्त्वोंमें स्थित पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंकी दीक्षा बतलायी जाती है। इन दोनों शान्तियोंके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे सौ-सौ आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिये। तत्पश्चात् साधक पूर्णाहुति देकर प्रसन्नतापूर्वक त्रिशूली भगवान् शिवका ध्यान करे।

उसके बाद प्रायश्चित्त-शुद्धिके लिये आठ बार आहुति देनी चाहिये। यह आहुति अस्त्र-बीज 'हुं फट्' मन्त्रसे प्रदान करनेका विधान है। इस प्रकार संस्कारसे शुद्ध हुआ वह साधक निःसंदेह शिव-स्वरूप हो जाता है।

शिवकी विशेष पूजामें साधकको चाहिये कि वह प्रथम—'ॐ हां आत्मतत्त्वाय स्वाहा', 'ॐ हीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा' तथा 'ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा'—ऐसा उच्चारण करके आचमन करे।


* यहाँ बाह्यपूजन तथा मानसपूजन दोनोंका एक साथ वर्णन है।