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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 522 of 634

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Page 522

५१२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-


करके मातृका-पूजनका कार्य करना चाहिये। तत्पश्चात् वह वसुधारा हवन सम्पन्न करे। अग्नि-स्थापन करके पूर्णाहुतिका कार्य करे। इसके बाद शालग्रामको स्थापित कर वैष्णव श्राद्ध करे। वस्त्राभूषणोंसे वृषको सुसज्जित करके उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर पहले चार बछियोंको सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित करे। वस्त्र और अलंकारसे विभूषित कर उन्हें उस यज्ञमें वृषके साथ स्थान दे। उसके बाद उनकी प्रदक्षिणा एवं होम करके अन्तमें विसर्जन करे। तत्पश्चात् उत्तराभिमुख होकर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—

धर्म त्वं वृषरूपेण ब्रह्मणा निर्मितः पुरा॥
तवोत्सर्गप्रभावान्मामुद्धरस्व भवार्णवात्।
(१४। २६-२७)

‘हे धर्म! पुराकालमें ब्रह्माने आपको वृषके रूपमें निर्मित किया है। आपके उत्सर्गके प्रभावसे मेरा भवसागरसे उद्धार हो।’

इसके बाद पवित्र करनेवाले शुभ मन्त्रोंसे विधिपूर्वक वृषको अभिषिक्त करके ‘तेन क्रीडन्ति०’ इस मन्त्रसे वृषोत्सर्ग करे। पुनः रुद्र नामक कुम्भके जलसे उस नील वृषका अभिषेक करना चाहिये। उसके बाद उस नील वृषके नाभिभागमें घटको स्पर्श कराके वह जल अपने सिरपर भी डालना चाहिये। हे पक्षिराज! तदनन्तर अन्नश्राद्ध कर द्विजोत्तमको दान देना चाहिये। इन कार्योंको करके जलाशयपर पहुँचे और वहाँ जलाञ्जलि क्रिया करे। मनुष्यको अपने जीवनमें जो वस्तु प्रिय हो, उसका यथाशक्ति वहाँपर दान करना चाहिये। वृषोत्सर्ग करनेपर न्यूनता पूरी हो जाती है। मृत व्यक्ति इससे भलीभाँति तृप्त होकर यमलोकके कठिन मार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है, इसमें संदेह नहीं है। सदैव दानादिकी क्रियाओंमें अनुरक्त मनुष्य यमलोकका दर्शनतक नहीं करते हैं। जबतक प्राणीका एकादशाह श्राद्ध नहीं किया जाता है, तबतक अपने द्वारा दिया गया दान अथवा दूसरेके हाथसे दिया गया दान न इस लोकमें प्राप्त होता है और न परलोकमें ही।

हे गरुड! श्रद्धाभावपूर्ण प्राणीको क्रमशः तेरह, सात, पाँच तथा तीन पद-दान करना चाहिये। अतः दाता पहले यथाक्रम सात एवं पाँच तिलपात्रोंका दान करे। वह ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें एक गौका दान भी दे। तत्पश्चात् ‘वृषं हि शं नो देवी०’ इस वेदमन्त्रसे यथाविधि चार बछियोंके साथ वृषका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर उसके शरीरमें बायीं ओर चक्र और दाहिनी ओर त्रिशूलका चिह्न अंकित करके और जिसको वृषदान किया गया है, उसको उसका मूल्य देकर विसर्जन कर दे।

बुद्धिमान् व्यक्तिको एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार क्रमशः प्रयत्नपूर्वक एकादशाह तथा द्वादशाह श्राद्ध करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पहले षोडश श्राद्ध सम्पन्न करे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें पद-दान दे। उसके बाद ताम्रपात्रमें कार्पास (सूती) वस्त्रपर भगवान् विष्णुकी मूर्तिको स्थापित करे और वस्त्रसे आच्छादित करके शुभ फलसे अर्घ्य समर्पित करे। तत्पश्चात् ईंखके पेड़ोंसे नौकाका निर्माण करके रेशमी सूत्रसे उसको लपेट दिया जाय। वैतरणीके निमित्त कांस्यपात्रमें घृत रखकर नौकारोहणकी क्रिया हो और भगवान् गरुडध्वजकी पूजा करे। सामर्थ्यके अनुसार किया गया दान अनन्त फलोंको देनेवाला है। भगवान् जनार्दन इस संसार-सागरमें डूब रहे शोक-संतापसे दुःखित तथा धर्मरूपी नौकासे रहित जनोंके उद्धारक हैं।

हे तार्क्ष्य! तिल, लौह, सुवर्ण, कार्पास वस्त्र, लवण, सप्तधान्य, पृथ्वी और गौ एक-से-एक बढ़कर पवित्र माने गये हैं। श्राद्धमें तिलसे परिपूर्ण पात्रोंका दान देकर शय्यादान देना चाहिये।