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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 505 of 634

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Page 505

प्रेतकल्प ] और्ध्वदैहिक क्रियाके अधिकारी ४९५


कार्य नहीं किया जाता, उसके शरीरसे मांस और रक्त बलात् अपहृत करके हम उसे पीड़ा पहुँचाते हैं। मांस खाना और रक्त पीना यही हमारा आचरण है। हे निष्पाप ! सभी लोगोंके द्वारा निन्दनीय हमारे आहारको सुनें। कुछ तो आपने देख लिया है और जो आपको मालूम नहीं है, उसको हम बता रहे हैं। हे विप्र ! वमन, विष्ठा, कीचड़, कफ, मूत्र और आँसुओंके साथ निकलनेवाला मल, हमारा भक्ष्य और पान है। इसके आगे न पूछें, क्योंकि अपने आहारको बताते हुए हमें बहुत लज्जा आ रही है। हे स्वामिन् ! हम सब अज्ञानी, तामसी, मन्दबुद्धि और भयसे भागनेवाले हैं। हे विप्र ! हममें पूर्वजन्मकी स्मृति एकाएक आ गयी है। अपने विनय या अविनयके संदर्भमें हम कुछ नहीं जानते हैं।

श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड ! प्रेतोंके ऐसा कहने एवं ब्राह्मणके सुननेके समय मैंने उन्हें दर्शन दिया। हृदयमें निवास करनेवाले अन्तर्यामी पुरुषके स्वरूपको सामने देखकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पृथ्वीपर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और स्तुतियोंसे मुझे संतुष्ट किया। आश्चर्यसे उत्फुल्ल नेत्रवाले उन प्रेतोंने तपस्या की। हे खगराज ! प्रेमाधिक्य होनेसे उनकी वाणी रुक गयी। उस समय उनके मुखसे कुछ भी नहीं निकल पा रहा था। स्खलित वाणीमें वह ब्राह्मण कहने लगा—

हे प्रभो! आप कृपा करके रजोगुणके कारण घोर चित्तवाले और तमोगुणसे मूढ़ चित्तवाले प्राणियोंका उद्धार करते हैं। आपको नमस्कार है।

ब्राह्मणने जैसे ही यह कहा, उसी समय मेरी इच्छासे अत्यन्त तेजस्वी, श्रेष्ठ आकाशचारी गन्धर्व एवं अप्सराओंसे युक्त छः विमान वहाँ आ पहुँचे। उन विमानोंकी प्रभासे वह पर्वत चतुर्दिक् आलोकित हो गया। उन पाँचोंके साथ वह ब्राह्मण विमानपर चढ़कर मेरे लोकको चला गया। (अध्याय ७)


और्ध्वदैहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि

गरुडने कहा— हे स्वामिन् ! इस सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कार्यको सम्पन्न करनेका अधिकारी कौन है ? यह क्रिया कितने प्रकारकी है ? यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश ! [जो मनुष्य मर जाता है, उसका और्ध्वदैहिक कार्य] पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाईकी संतान अथवा सपिण्ड या जातिके लोग कर सकते हैं। इन सभीके अभावमें समानोदक संतान इस कार्यको करनेका अधिकारी है। यदि दोनों कुलों (मातृकुल एवं पितृकुल)-के पुरुष समाप्त हो गये हों तो स्त्रियाँ इस कार्यको कर सकती हैं। यदि मनुष्यने इच्छापूर्वक अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है तो उसका और्ध्वदैहिक कार्य राजाको कराना चाहिये।

यह क्रिया तीन प्रकारकी है, जिनको पूर्व, मध्यम एवं उत्तर क्रियाओंकी संज्ञा दी गयी है। हे पक्षिन् ! इस क्रियाको प्रतिसंवत्सर एकोद्दिष्ट-विधानसे करना अपेक्षित है। इस श्राद्ध-क्रियाके फलको तुम मुझसे सुनो।

ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसु, मरुद्गण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, मातृगण और इनके अतिरिक्त जो भी प्राणी इस संसारमें उत्पन्न हैं, उन सभीको श्रद्धापूर्वक किये जा रहे श्राद्धसे मनुष्य प्रसन्न कर सकता है। ऐसे श्राद्धसे तो सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न हो