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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 474 of 634

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Page 474

४६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड -

तिलपात्र, घृतपात्र, शय्या, उपस्कर तथा और
भी जो कुछ अपनेको इष्ट हो, वह सब देना
चाहिये। अश्व, रथ, भैंस, भोजन, वस्त्रका दान
ब्राह्मणोंको करना चाहिये। अन्य दान भी अपनी
शक्तिके अनुसार देना चाहिये।

हे पक्षिराज! इस पृथ्वीपर जिसने पापका
प्रायश्चित्त कर लिया है, वह दस प्रकारके दान भी
दे चुका है, वैतरणी गौ एवं अष्टदान कर चुका है,
तिलसे भरा पूर्ण पात्र, घीसे भरा हुआ पात्र,
शय्यादान और विधिवत् पददान करता है तो वह
नरकरूपी गर्भमें नहीं आता है अर्थात् उसका
पुनर्जन्म नहीं होता-

प्रायश्चित्तं कृतं येन दश दानान्यपि क्षितौ ॥
दानं गौर्वैतरण्याश्च दानान्यष्टौ तथापि वा ।
तिलपात्रं सर्पिःपात्रं शय्यादानं तथैव च ॥
पददानं च विधिवन्नासौ निरयगर्भकः ।
(४।१२-१४)

पण्डित लोग स्वतन्त्र रूपसे भी लवण दान
करनेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि यह लवण-रस
विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, इस पृथ्वीपर
मरणासन्न प्राणीके प्राण जब न निकल रहे हों तो
उस समय लवण-रसका दान उसके हाथसे दिलवाना
चाहिये; क्योंकि यह दान उसके लिये स्वर्गलोकके
द्वार खोल देता है। मनुष्य स्वयं जो कुछ दान देता
है, परलोकमें वह सब उसे प्राप्त होता है। वहाँ
उसके आगे रखा हुआ मिलता है। हे पक्षिन् !
जिसने यथाविधि अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर
लिया है, वही पुरुष है। वही अपने पापोंको
भस्मसात् करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास
करता है।

हे खगराज ! गौका दूध अमृत है। इसलिये जो
मनुष्य दूध देनेवाली गौका दान देता है, वह
अमृतत्वको प्राप्त करता है। पहले कहे गये

तिलादिक आठ प्रकारके दान देकर प्राणी
गन्धर्वलोकमें निवास करता है। यमलोकका मार्ग
अत्यधिक भीषण तापसे युक्त है, अतः छत्रदान
करना चाहिये। छत्रदान करनेसे मार्गमें सुख प्रदान
करनेवाली छाया प्राप्त होती है। जो मनुष्य इस
जन्ममें पादुकाओंका दान देता है, वह 'असिपत्रवन' के
मार्गको घोड़ेपर सवार होकर सुखपूर्वक पार करता
है। भोजन और आसनका दान देनेसे प्राणीको
परलोकगमनके मार्गमें सुखका उपभोग प्राप्त होता
है। जलसे परिपूर्ण कमण्डलुका दान देनेवाला पुरुष
सुखपूर्वक परलोकगमन करता है।

यमराजके दूत महाक्रोधी और महाभयंकर हैं।
काले एवं पीले वर्णवाले उन दूतोंको देखनेमात्रसे
भय लगने लगता है। उदारतापूर्वक वस्त्र-
आभूषणादिका दान करनेसे वे यमदूत प्राणीको
कष्ट नहीं देते हैं। तिलसे भरे हुए पात्रका जो दान
ब्राह्मणको दिया जाता है, वह मनुष्यके मन, वाणी
और शरीरके द्वारा किये गये त्रिविध पापोंका
विनाश कर देता है। मनुष्य घृतपात्रका दान करनेसे
रुद्रलोक प्राप्त करता है। ब्राह्मणको सभी साधनोंसे
युक्त शय्याका दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें नाना
प्रकारकी अप्सराओंसे युक्त विमानमें चढ़कर साठ
हजार वर्षतक अमरावतीमें क्रीडा करके इन्द्रलोकके
बाद गिरकर पुनः इस पृथ्वीलोकमें आकर राजाका
पद प्राप्त करता है। जो मनुष्य काठी आदि
उपकरणोंसे सजे-धजे, दोषरहित जवान घोड़ेका
दान ब्राह्मणको देता है, उसको स्वर्गकी प्राप्ति
होती है। हे खगेश ! दानमें दिये गये इस घोड़ेके
शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्ष (कालतक)
स्वर्गके लोकोंका भोग दानदाताको प्राप्त होता है।
प्राणी ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त चार घोड़ोंवाले
रथका दान दे करके राजसूय यज्ञका फल प्राप्त
करता है। यदि कोई व्यक्ति सुपात्र ब्राह्मणको