गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextप्रेतकल्प ] नरकोंका स्वरूप ४६१
बाग-बगीचोंमें आग लगाता है, उसे 'विषञ्जन' नामक नरककी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य असत्-पात्रसे दान लेता है तथा असत् प्रतिग्रह लेनेवाला, अयाज्ययाजक और जो नक्षत्रसे जीविकोपार्जन करता है, वह मनुष्य 'अधःशिर' नरकमें जाता है। जो मदिरा, मांस आदि पदार्थोंका विक्रेता है, वह 'पूयवह' नामक घोर नरकमें गिरता है। जो कुक्कुट, बिल्ली, सुअर, पक्षी, मृग, भेंड़को बाँधता है, वह भी उसी प्रकारके नरकमें जाता है। जो गृहदाही है, जो विषदाता है, जो कुण्डाशी है, जो सोमविक्रेता है, जो मद्यपी है, जो मांसभोजी है तथा जो पशुहन्ता है, वह व्यक्ति 'रुधिरान्ध' नामक नरकमें जाता है, ऐसा विद्वानोंका अभिमत है। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए किसी प्राणीको धोखा देकर जो लोग विष खिला देते हैं, उन सभीको 'विद्भुज' नामक घोर नरक प्राप्त होता है। मधु निकालनेवाला मनुष्य 'वैतरणी' और क्रोधी 'मूत्रसंज्ञक' नामक नरकमें जाता है। अपवित्र और क्रोधी व्यक्ति 'असिपत्रवन' नामक नरकमें जाता है। मृगोंका शिकार करनेवाला व्याध 'अग्निज्वल' नामक नरकमें जाता है, जहाँ उसके शरीरको नोच-नोचकर कौवे खाते हैं।
यज्ञकर्ममें दीक्षित होनेपर जो व्रतका पालन नहीं करता, उसे उस पापसे 'संदंश' नरकमें जाना पड़ता है। यदि स्वप्नमें भी संन्यासी या ब्रह्मचारी स्खलित हो जाते हैं तो वे 'अभोजन' नामक नरकमें जाते हैं। जो लोग क्रोध और हर्षसे भरकर वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध कर्म करते हैं, उन सबको नरकलोककी प्राप्ति होती है।
सबसे ऊपर भयंकर गर्मीसे संतप्त रौरव नामक नरक है। उसके नीचे अत्यन्त दुःखदायी महारौरव है। उस नरकसे नीचे शीतल और उस नरकके बाद नीचे 'तामस' नरक माना गया है। इसी प्रकार बताये गये क्रमसे अन्य नरक भी नीचे ही हैं।
इन नरकलोकोंके अतिरिक्त भी सैकड़ों नरक हैं, जिनमें पहुँचकर पापी प्रतिदिन पकता है, जलता है, गलता है, विदीर्ण होता है, चूर्ण किया जाता है, गीला होता है, क्वाथ बनाया जाता है, जलाया जाता है और कहीं वायुसे प्रताड़ित किया जाता है—ऐसे नरकोंमें एक दिन सौ वर्षके समान होता है। सभी नरकोंसे भोग भोगनेके बाद पापी तिर्यक्-योनिमें जाता है। तत्पश्चात् उसको कृमि, कीट, पतंग, स्थावर तथा एक खुरवाले गधेकी योनि प्राप्त होती है। तदनन्तर मनुष्य जंगली हाथी आदिकी योनियोंमें जाकर गौकी योनिमें पहुँचता है। हे गरुड! गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर मृग, शरभ और चमरी—ये छः योनियाँ एक खुरवाली होती हैं। इनके अतिरिक्त बहुत-सी पापाचार-योनियाँ भी हैं, जिनमें जीवात्माको कष्ट भोगना पड़ता है। उन सभी योनियोंको पाकर प्राणी मनुष्य-योनिमें आता है और कुबड़ा, कुत्सित, वामन, चाण्डाल और पुल्कश आदि नर-योनियोंमें जाता है। अवशिष्ट पाप-पुण्यसे समन्वित जीव बार-बार गर्भमें जाता है और मृत्युको प्राप्त होता है। उन सभी पापोंके समाप्त हो जानेके बाद प्राणीको शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रिय आदिकी आरोहिणी-योनि प्राप्त होती है। कभी-कभी वह सत्कर्मसे ब्राह्मण, देव और इन्द्रत्वके पदपर भी पहुँच जाता है।
हे गरुड! यमद्वारा निर्दिष्ट योनिमें पुण्यगति प्राप्त करनेमें जो प्राणी सफल हो जाते हैं, वे सुन्दर-सुन्दर गीत गाते, वाद्य बजाते और नृत्यादि करते हुए प्रसन्नचित्त गन्धर्वोंके साथ, अच्छे-से-अच्छे हार, नूपुर आदि नाना प्रकारके आभूषणोंसे युक्त, चन्दन आदिकी दिव्य सुगन्ध