गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
Page 461 of 634
Read in contextप्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५१
कुशके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें विष्णु तथा अग्रभागमें शिवको जानना चाहिये; ये तीनों देव कुशमें प्रतिष्ठित माने गये हैं। हे पक्षिराज ! ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि और तुलसी—ये बार-बार समर्पित होनेपर भी पर्युषित नहीं माने जाते, कभी निर्माल्य अर्थात् बासी नहीं होते। इनका पूजामें बारम्बार प्रयोग किया जा सकता है। हे खगेन्द्र ! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशीव्रत—ये पाँचों संसारसागरमें डूबते हुए लोगोंको नौकाके समान पार कराते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! विष्णु, एकादशीव्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ—ये छह इस असार-संसारमें लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके साधन हैं, यह षट्पदी कहलाती है—
दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः ॥
दर्भाग्रे शंकरं विद्यात् त्रयो देवाः कुशे स्मृताः।
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर ॥
नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः।
तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ॥
पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम्।
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।
(२। २१—२५)
जैसे तिलकी पवित्रता अतुलनीय होती है, उसी प्रकार कुश और तुलसी भी अत्यन्त पवित्र होते हैं। ये तीनों पदार्थ मरणासन्न व्यक्तिको दुर्गतिसे उबार लेते हैं*। दोनों हाथोंसे कुश उखाड़ना चाहिये और उसे पृथ्वीपर रखकर जलसे प्रोक्षित करना चाहिये तथा मृत्युकालमें मरणासन्नके दोनों हाथोंमें रखना चाहिये। जिसके हाथोंमें कुशाएँ हैं और जो कुशसे परिवेष्टित कर दिया जाता है, वह मन्त्रहीन होनेपर (उसकी समन्त्रक क्रियाएँ न हो पायी हों, तब) भी विष्णुलोकको प्राप्त करता है। इस असार संसारसागरमें भूमिको गोबरसे लीपकर उसपर मृत मनुष्यको सुलानेसे और कुशासनपर स्थित करनेसे तथा विशुद्ध अग्निमें दाह करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है।
लवण और उसका रस दिव्य (उत्तम लोकका प्रापक) है, वह प्राणियोंकी समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। लवणके बिना अन्न-रस उत्कट अर्थात् न अभिव्यक्त होते हैं और न सुस्वादु होते हैं। इसीलिये लवण-रस पितरोंको प्रिय होता है और स्वर्गको प्रदान करनेवाला है। यह लवण-रस भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है। इस बातको जाननेवाले योगीजन, लवणके साथ दान करनेको कहते हैं। इस पृथ्वीपर यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री तथा शूद्र वर्णके आतुर व्यक्तिके प्राण न निकलते हों तो उसके लिये स्वर्गका द्वार खोलनेके लिये लवणका दान देना चाहिये।
हे पक्षीन्द्र ! अब मृत्युके स्वरूपको विस्तारपूर्वक सुनें। मृत्यु ही काल है, उसका समय आ जानेपर जीवात्मासे प्राण और देहका वियोग हो जाता है। मृत्यु अपने समयपर आती है। मृत्युकष्टके प्रभावसे प्राणी अपने किये कर्मोंको एकदम भूल जाता है। हे गरुड ! जिस प्रकार वायु मेघमण्डलोंको इधर-उधर खींचता है, उसी प्रकार प्राणी कालके वशमें रहता है। सात्त्विक, राजस और तामस—ये सभी भाव कालके वशमें हैं। प्राणियोंमें वे कालके अनुसार अपने-अपने प्रभावका विस्तार करते हैं। हे सर्पहन्ता गरुड ! सूर्य, चन्द्र, शिव, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, औषधि, आठों वसु, नदी, सागर और भाव-अभाव—ये सभी कालके अनुसार यथासमय उद्भूत होते हैं, बढ़ते हैं, घटते
* तिलाः पवित्रमतुलं दर्भाश्चापि तुलस्यथ ॥
निवारयन्ति चैतानि दुर्गतिं यान्तमातुरम् ॥ (२। २५-२६)