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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 459 of 634

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Page 459

प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४४९


रहनेवाले लोग बहुत-से दुःखोंको भोग रहे हैं। मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग-द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं। उस देशमें कुछ लोग अन्धे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले हैं, कुछ दुष्ट वाणीवाले हैं, कुछ लूले हैं, कुछ लँगड़े हैं, कुछ काने हैं, कुछ बहरे हैं, कुछ गूँगे हैं, कुछ कोढ़ी हैं, कुछ लोमश (अधिक रोमवाले) हैं, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमकी तरह नितान्त मिथ्या अभिमानसे चूर हैं। उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यतः यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है। फिर भी हे प्रभो! इसकी विशेष जानकारीके लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ।

हे उपेन्द्र! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये क्या करना चाहिये? कैसा दान देना चाहिये। मृत्यु और श्मशान-भूमितक पहुँचनेके बीच कौन-सी विधि अपेक्षित है। चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक (संयमनी नगरी)-को जानेवालेके लिये वर्षपर्यन्त कौन-सी क्रियाएँ करनी चाहिये। दुर्बुद्धि अर्थात् दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है? पञ्चक आदिमें मृत्यु होनेपर पञ्चकशान्तिके लिये क्या करना चाहिये। हे देव! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। मैंने आपसे यह सब लोकमङ्गलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें। (अध्याय १)


मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन

श्रीकृष्णने कहा— हे भद्र! आपने मनुष्योंके हितमें बहुत ही अच्छी बात पूछी है। सावधान होकर इस समस्त और्ध्वदेहिक क्रियाको भलीभाँति सुनें।

हे गरुड! जो सम्यक् रूपसे भेदरहित है, जिसका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें हुआ है, जिसको इन्द्रादि देवता, योगीजन और योगमार्गका चिन्तन करनेवाले विद्वान् नहीं देख सके हैं, जो गुह्यातिगुह्य है, ऐसे उस प्रधान तत्त्वको जिसे मैंने अभीतक किसी अन्यसे नहीं कहा है, तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

हे वैनतेय! इस संसारमें पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है। अतः शास्त्रानुसार यथायोग्य उपायसे पुत्र उत्पन्न करना ही चाहिये। यदि मनुष्यको मोक्ष नहीं मिलता है तो पुत्र नरकसे उसका उद्धार कर देता है। पुत्र और पौत्रको मरे हुए प्राणीको कन्धा देना चाहिये तथा उसका यथाविधान अग्निदाह करना चाहिये। शवके नीचे पृथ्वीपर तिलके सहित कुश बिछानेसे शवकी आधारभूत भूमि उस ऋतुमती नारीके समान हो जाती है, जो प्रसवकी योग्यता रखती है। मृतकके मुखमें पञ्चरत्न डालना बीजवपनके समान है, जिससे आगे जीवकी शुभगतिका निश्चय होता है। जैसे पुष्प (ऋतुकालमें स्त्रियोंका रजोदर्शन) न होनेपर गर्भधारण सम्भव नहीं है, वैसे ही शवभूमि भी तिल-कुश आदिके बिना जीवकी शुभ योनिमें